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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 5/6/1

31 Sukta
14 Mantra
5/6/1
Devata- ब्रह्म Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मविद्या सूक्त
Mantra with Swara
ब्रह्म॑ जज्ञा॒नं प्र॑थ॒मं पु॒रस्ता॒द्वि सी॑म॒तः सु॒रुचो॑ वे॒न आ॑वः। स बु॒ध्न्या॑ उप॒मा अ॑स्य वि॒ष्ठाः स॒तश्च॒ योनि॒मस॑तश्च॒ वि वः॑ ॥

ब्रह्म॑ । ज॒ज्ञा॒नम् । प्र॒थ॒मम् । पु॒रस्ता॑त् । वि । सी॒म॒त: । सु॒ऽरुच॑: । वे॒न: । आ॒व॒: । स: । बु॒ध्न्या᳡: । उ॒प॒ऽमा:। अ॒स्य॒ । वि॒ऽस्था: । स॒त: । च॒ । योनि॑म् । अस॑त: । च॒ । व‍ि । व॒: ॥६.१॥

Mantra without Swara
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः। स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः ॥

ब्रह्म । जज्ञानम् । प्रथमम् । पुरस्तात् । वि । सीमत: । सुऽरुच: । वेन: । आव: । स: । बुध्न्या: । उपऽमा:। अस्य । विऽस्था: । सत: । च । योनिम् । असत: । च । व‍ि । व: ॥६.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (वेन:) = वेन् [1o go, to know, to worship] गतिशील ज्ञानी उपासक (पुरस्तात्) = सृष्टि के प्रारम्भ में (जज्ञानम्) = प्रादुर्भूत होनेवाले (प्रथमम्) = अतिविस्तृत 'प्रकृति, जीव व परमात्मा'-तीनों का ही ज्ञान देनेवाले वेदज्ञान को (सीमतः) = मर्यादा में चलने के द्वारा और (सुरुचः) = परिष्कृत रुचि के द्वारा-सात्त्विक प्रवृत्ति के द्वारा (वि आव:) = अपने हृदय में प्रकट करता है। २. (स:) = वह वेन (अस्य) = इस प्रभु के इन (बुद्न्या:) = अन्तरिक्ष में होनेवाले (उपमा) = उपमा देने योग्य अर्थात् अद्भुत [जैसे 'ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिः'] (विष्ठा:) = अलग-अलग, अपनी-अपनी मर्यादा में स्थित सूर्यादि लोकों को (वि आव:) = विशदरूप में देखता है (च) = और (सतः असत: च) = दृश्य कार्यजगत् तथा अदृश्य कारणजगत् के (योनिम्) = आधारभूत उस प्रभु को विव: अपने हृदय में प्रकट करता है। सूर्यादि लोकों में उसे प्रभु की महिमा दीखती है।
Essence
सृष्टि के प्रारम्भ में वेदज्ञान का प्रकाश होता है। इसकी प्राति के लिए आवश्यक है कि जीवन मर्यादा-सम्पन्न हो तथा उत्तम रुचिवाला हो। सब लोक-लाकान्तरों में यह क्रियाशील ज्ञानी उपासक प्रभु की महिमा को देखता है। प्रभु को ही कार्य-कारणात्मकजगत् की योनि जानता है।
Subject
सीमत: सुरुचः