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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 5/5/1

31 Sukta
9 Mantra
5/5/1
Devata- लाक्षा Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- लाक्षा
Mantra with Swara
रात्री॑ मा॒ता नभः॑ पि॒तार्य॒मा ते॑ पिताम॒हः। सि॑ला॒ची नाम॒ वा अ॑सि॒ सा दे॒वाना॑मसि॒ स्वसा॑ ॥

रात्री॑ । मा॒ता । नभ॑: । पि॒ता । अ॒र्य॒मा । ते॒ । पि॒ता॒म॒ह: । सि॒ला॒ची । नाम॑ । वै । अ॒सि॒ । सा । दे॒वाना॑म् । अ॒सि॒ । स्वसा॑ ॥५.१॥

Mantra without Swara
रात्री माता नभः पितार्यमा ते पितामहः। सिलाची नाम वा असि सा देवानामसि स्वसा ॥

रात्री । माता । नभ: । पिता । अर्यमा । ते । पितामह: । सिलाची । नाम । वै । असि । सा । देवानाम् । असि । स्वसा ॥५.१॥

Meaning
१. हे लाक्षे! (रात्री माता) = रात्रि तेरी माता है। रात्रि में बढ़ने के कारण लाक्षा को रात्रिरूप मातावाली कहा गया है। ओस-बिन्दु इसके वर्धक होते हैं। (नभः पिता) = पर्जन्य तेरा पिता है। आकाश से बरसा हुआ बादलों का पानी इस लाक्षा की वृद्धि का कारण बनता है। (अर्यमा) = सूर्य (ते) = तेरा (पितामहः) = पितामह स्थानापन्न है। सूर्य से उद्गाष्पित जल ही मेघ बनते हैं। मेघ लाक्षा को पैदा करते हैं। इसप्रकार सूर्य'लाक्षा के पिता मेघों' का पिता होने से लाक्षा का पितामह हो जाता है। २. हे लाक्षे! तू (सिलाची नाम वा असि) = निश्चय से सिलाची नामवाली है [शिल श्लेषे, अब्बु पूजायाम्] श्लेष में पूजित है-फटावों को भर देने में उत्तम है। (सा) = वह तू (देवानाम्) = सब इन्द्रियों की (स्वसा असि) = स्वसा है-उन्हें उत्तम स्थिति में रखनेवाली है।
Essence
लाक्षा की उत्पत्ति रात्रि की ओस व वृष्टि-जल से होती है। यह घावों को भर देने में उत्तम है तथा इन्द्रिय-दोषों को दूर करती है।


 
Subject
सिलाची देवस्वसा

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