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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 5/4/7

31 Sukta
10 Mantra
5/4/7
Devata- कुष्ठस्तक्मनाशनः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कुष्ठतक्मनाशन सूक्त
Mantra with Swara
दे॒वेभ्यो॒ अधि॑ जा॒तोऽसि॒ सोम॑स्यासि॒ सखा॑ हि॒तः। स प्रा॒णाय॑ व्या॒नाय॒ चक्षु॑षे मे अ॒स्मै मृ॑ड ॥

दे॒वेभ्य॑: । अधि॑ । जा॒त: । अ॒सि॒ । सोम॑स्य । अ॒सि॒ । सखा॑ । हि॒त: । स: । प्रा॒णाय॑ । वि॒ऽआ॒नाय॑ । चक्षु॑षे । मे॒ । अ॒स्मै । मृ॒ड॒ ॥४.७॥

Mantra without Swara
देवेभ्यो अधि जातोऽसि सोमस्यासि सखा हितः। स प्राणाय व्यानाय चक्षुषे मे अस्मै मृड ॥

देवेभ्य: । अधि । जात: । असि । सोमस्य । असि । सखा । हित: । स: । प्राणाय । विऽआनाय । चक्षुषे । मे । अस्मै । मृड ॥४.७॥

Meaning
१.हे कुष्ठ! तु (देवेभ्यः) = सूर्य, वायु, पृथिवी आदि देवों के द्वारा (अधि जातः असि) = प्रकट हुआ है। (सोमस्य) = शरीरस्थ सोमशक्ति का तू (हितः सखा असि) = हितकर मित्र के रूप में स्थापित हुआ है। (सोम) = रक्षण में यह कुष्ठ सहायक है। २. (स:) = वह तू (मे अस्यै) = मेरे इस (प्राणाय) = प्राणशक्ति के लिए, (व्यानाय) = व्यानशक्ति के लिए तथा (चक्षुषे) = दृष्टिशक्ति के लिए (मृड) = सुखकर हो।
Essence
कुष्ठ औषध शरीरस्थ विकारों को दूर करता हुआ प्राणादि वायुओं की क्रिया को ठीक करता है और इसप्रकार आँख आदि सब इन्द्रियों की शक्ति को बढ़ाता है।
Subject
सोमस्य हितः सखा

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