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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 5/4/2

31 Sukta
10 Mantra
5/4/2
Devata- कुष्ठस्तक्मनाशनः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कुष्ठतक्मनाशन सूक्त
Mantra with Swara
सु॑पर्ण॒सुव॑ने गि॒रौ जा॒तं हि॒मव॑त॒स्परि॑। धनै॑र॒भि श्रु॒त्वा य॑न्ति वि॒दुर्हि त॑क्म॒नाश॑नम् ॥

सु॒प॒र्ण॒ऽसुव॑ने । गि॒रौ । जा॒तम् । हि॒मऽव॑त: । परि॑ । धनै॑: । अ॒भि । श्रु॒त्वा । य॒न्ति॒ । वि॒दु: । हि । त॒क्म॒ऽनाश॑नम् ॥४.२॥

Mantra without Swara
सुपर्णसुवने गिरौ जातं हिमवतस्परि। धनैरभि श्रुत्वा यन्ति विदुर्हि तक्मनाशनम् ॥

सुपर्णऽसुवने । गिरौ । जातम् । हिमऽवत: । परि । धनै: । अभि । श्रुत्वा । यन्ति । विदु: । हि । तक्मऽनाशनम् ॥४.२॥

Meaning
२. (सुपर्णसुवने) = पालनात्मक उत्तम औषधियों को जन्म देनेवाले (गिरौ) = पर्वत पर (हिमवतः परिजातम्) = हिमाच्छादित प्रदेशों में उत्पन्न हुए-हुए 'कुष्ठ' को (श्रुत्वा) = सुनकर (धनैः अभियन्ति) = धनों से उसकी ओर जाते हैं-धन लेकर उस ओषधि के क्रय के लिए जाते हैं। २. इस कुष्ठ को वे (हि) = निश्चय से (तक्मनाशनम् विदुः) = ज्वरनाशक जानते हैं।
Essence
कुष्ठ नामक औषध उन हिमाच्छादित पर्वतों पर होती है जो पालनात्मक उत्तम ओषधियों को जन्म देनेवाले हैं। मनुष्य धन लेकर इनके क्रय के लिए उन स्थानों पर पहुँचते हैं।
Subject
हिमाच्छादित पर्वतों पर होनेवाला 'कुष्ठ'

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