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Atharvaveda - Mantra 17

Atharvaveda 5/30/17

31 Sukta
17 Mantra
5/30/17
Devata- आयुः Rishi- चातनः Chhanda- त्र्यवसाना षट्पदा जगती Suktam- दीर्घायुष्य सूक्त
Mantra with Swara
अ॒यं लो॒कः प्रि॒यत॑मो दे॒वाना॒मप॑राजितः। यस्मै॒ त्वमि॒ह मृ॒त्यवे॑ दि॒ष्टः पु॑रुष जज्ञि॒षे। स च॒ त्वानु॑ ह्वयामसि॒ मा पु॒रा ज॒रसो॑ मृथाः ॥

अ॒यम् । लो॒क: । प्रि॒यऽत॑म: । दे॒वाना॑म् । अप॑राऽजित: । यस्मै॑ । त्वम् । इ॒ह । मृ॒त्यवे॑ । दि॒ष्ट: । पु॒रु॒ष॒ । ज॒ज्ञि॒षे । स: । च॒ । त्वा॒ । अनु॑ । ह्व॒या॒म॒सि॒ । मा । पु॒रा । ज॒रस॑: । मृ॒था॒: ॥३०.१७॥

Mantra without Swara
अयं लोकः प्रियतमो देवानामपराजितः। यस्मै त्वमिह मृत्यवे दिष्टः पुरुष जज्ञिषे। स च त्वानु ह्वयामसि मा पुरा जरसो मृथाः ॥

अयम् । लोक: । प्रियऽतम: । देवानाम् । अपराऽजित: । यस्मै । त्वम् । इह । मृत्यवे । दिष्ट: । पुरुष । जज्ञिषे । स: । च । त्वा । अनु । ह्वयामसि । मा । पुरा । जरस: । मृथा: ॥३०.१७॥

Meaning
१. (अयं लोक:) = यह शरीर (प्रियतमः) = अत्यन्त प्रिय है। यह (देवानाम्) = प्रकाशक इन्द्रियों का (अपराजितः) =  अपराजित लोक है। २. हे (पुरुष) = पुरुष! (यस्मै) = जिस कारण से (त्वम्) = तू (इह) = यहाँ इस संसार में (मृत्यवे दिष्टः) = मृत्यु के भाग्य में पड़ा हुआ ही जज्ञिषे उत्पन्न होता है (स: च) = वह जो तू है, उस (त्वा) = तुझे (अनु हयामसि) = फिर से चेताते हैं-पुकारते हैं कि (जरसः पुरः) = जरावस्था से पूर्व (मा मृथा:) = प्राणों को मत छोड़।
Essence
यह शरीर इन्द्रियों का प्रियतम अपराजित लोक है। इसमें जीव मृत्यु के लिए दिष्ट हुआ-हुआ ही जन्म लेता है। उसे हम चेताते हैं कि 'पूर्ण वृद्धावस्था से पहले मरे नहीं'।
Subject
अपराजित प्रियतम लोक
Special
प्राणापान की शक्ति से सम्पन्न यह पुरुष 'शुक्रः' कहलाता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है -

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