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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 5/3/10

31 Sukta
11 Mantra
5/3/10
Devata- धाता, विधाता, सविता, आदित्यगणः, रुद्रगणः, अश्विनीकुमारः Rishi- बृहद्दिवोऽथर्वा Chhanda- विराड्जगती Suktam- विजयप्रार्थना सूक्त
Mantra with Swara
ये नः॑ स॒पत्ना॒ अप॒ ते भ॑वन्त्विन्द्रा॒ग्निभ्या॒मव॑ बाधामह एनान्। आ॑दि॒त्या रु॒द्रा उ॑परि॒स्पृशो॑ नो उ॒ग्रं चे॒त्तार॑मधिरा॒जम॑क्रत ॥

ये । न॒: । स॒ऽपत्ना॑: । अप॑। ते । भ॒व॒न्तु॒ । इ॒न्द्रा॒ग्निऽभ्या॑म् । अव॑ । बा॒धा॒म॒हे॒ । ए॒ना॒न् । आ॒दि॒त्या: । रु॒द्रा: । उ॒प॒रि॒ऽस्पृश॑: । न॒: । उ॒ग्रम् । चे॒त्तार॑म् । अ॒धि॒ऽरा॒जम् । अ॒क्र॒त॒ ॥३.१०॥

Mantra without Swara
ये नः सपत्ना अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामह एनान्। आदित्या रुद्रा उपरिस्पृशो नो उग्रं चेत्तारमधिराजमक्रत ॥

ये । न: । सऽपत्ना: । अप। ते । भवन्तु । इन्द्राग्निऽभ्याम् । अव । बाधामहे । एनान् । आदित्या: । रुद्रा: । उपरिऽस्पृश: । न: । उग्रम् । चेत्तारम् । अधिऽराजम् । अक्रत ॥३.१०॥

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Meaning
१. (ये) = जो (न:) = हमारे (सपत्ना:) = काम-क्रोध, लोभ आदि [स्वत्व पर समान अधिकार जमानेवाले] शत्रु हैं (ते) = वे (अप भवन्तु) = हमसे दूर रहें। (इन्द्राग्रिभ्याम्) = [इन्द्र-बल, अग्नि-प्रकाश] बल व प्रकाश के हेतु से (एनान्) = इन शत्रुओं को (अप बाधामहे) = अपने से दूर ही करते हैं। 'काम' को दूर करके ही हम शरीर से सबल हो पाएँगे। क्रोध व लोभ का विनाश ही हमारे ज्ञान के प्रकाश को दीप्त करेगा। (न:) = हममें जो भी (आदित्या:) = सूर्य के समान ज्ञान के प्रकाशवाले, (रुद्राः) = रोगों को दूर भगानेवाले व (उपरिस्पृश:) = संसार के विषयों के स्पर्श से ऊपर उठनेवाले होते हैं-मात्रा-स्पों में आसक्त नहीं होते वे (उग्रम्) = उस तेजस्वी, (चेत्तारम्) = सर्वज्ञ व उपासकों को चेतानेवाले प्रभु को (अधि राजम् अक्रत) = अधिराज बनाते हैं, प्रभु को ही अपना स्वामी जानते हैं। इसप्रकार ये पवित्र और निर्भीक जीवनवाले बनते हैं। वस्तुत: प्रभु को अधिराज बनाकर ही वे आदित्य, रुद्र व उपरिस्पृश' बन पाते हैं।
Essence
काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं को दूर भगाकर हम बल व प्रकाश का सम्पादन करें। ज्ञानसूर्य को उदित करके तथा रोगों को दूर भगाकर हम विषयों के स्पर्श से ऊपर उठे और प्रभु को ही अपना अधिराज जानें।
Subject
आदित्यः, रुद्रः, उपरिस्पृश्