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Atharvaveda - Mantra 15

Atharvaveda 5/29/15

31 Sukta
15 Mantra
5/29/15
Devata- जातवेदाः Rishi- चातनः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- रक्षोघ्न सूक्त
Mantra with Swara
ता॑र्ष्टा॒घीर॑ग्ने स॒मिधः॒ प्रति॑ गृह्णाह्य॒र्चिषा॑। जहा॑तु क्र॒व्याद्रू॒पं यो अ॑स्य मां॒सं जिही॑र्षति ॥

ता॒र्ष्ट॒ऽअ॒घी: । अ॒ग्ने॒ । स॒म्ऽइध॑: । प्रति॑ । गृ॒ह्णा॒हि॒ । अ॒र्चिषा॑ । जहा॑तु । क्र॒व्य॒ऽअत् । रू॒पम् । य: । अ॒स्य॒ । मां॒सम् । जिही॑र्षति ॥२९.१५॥

Mantra without Swara
तार्ष्टाघीरग्ने समिधः प्रति गृह्णाह्यर्चिषा। जहातु क्रव्याद्रूपं यो अस्य मांसं जिहीर्षति ॥

तार्ष्टऽअघी: । अग्ने । सम्ऽइध: । प्रति । गृह्णाहि । अर्चिषा । जहातु । क्रव्यऽअत् । रूपम् । य: । अस्य । मांसम् । जिहीर्षति ॥२९.१५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. तार्ष्टाघी: = [ताष्ट अघि गत्याक्षेपणयोः] तृष्णा को विनष्ट करनेवाली (समिधः) = ज्ञानदीसियों को (अर्चिषा) = [अर्च पूजायाम्] प्रभु-पूजन के द्वारा (प्रतिगृह्राहि) = ग्रहण करनेवाला बन। २. इसप्रकार प्रभुपूजन व ज्ञान-दीसियों में प्रवृत्त, लोभनिवृत्त पुरुष को (यः) = जो भी रोगकृमि सताता है और (अस्य) = इसके (मांसम्) = मांस को (जिहीर्षति) = हरना चाहता है, वह (क्रव्यात्) = मांसभक्षक कृमि (रूपं जहातु) = अपने रूप को छोड़ दे, अर्थात् वह कृमि नष्ट हो जाए।
Essence
ज्ञानदीप्ति तृष्णा को नष्ट करती है। यह ज्ञानदीप्ति प्रभुपूजन से प्राप्त होती है। इस ज्ञानदीस पुरुष को रोग नहीं सताते।
Subject
तार्ष्टाघी: समिधः
Special
सब रोगों को अपने से पृथक् करनेवाला-रोगों से अपना पीछा छुड़ानेवाला यह ऋषि 'उन्मोचन' है। यही अगले सूक्त का ऋषि है