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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 5/28/5

31 Sukta
14 Mantra
5/28/5
Devata- अग्न्यादयः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- दीर्घायु सूक्त
Mantra with Swara
भूमि॑ष्ट्वा पातु॒ हरि॑तेन विश्व॒भृद॒ग्निः पि॑प॒र्त्वय॑सा स॒जोषाः॑। वी॒रुद्भि॑ष्टे॒ अर्जु॑नं संविदा॒नं दक्षं॑ दधातु सुमन॒स्यमा॑नम् ॥

भूमि॑: । त्वा॒ । पा॒तु॒। हरि॑तेन । वि॒श्व॒ऽभृत् । अ॒ग्नि: । पि॒प॒र्तु॒ । अय॑सा । स॒ऽजोषा॑: । वी॒रुत्ऽभि॑: । ते॒ । अर्जु॑नम् । स॒म्ऽवि॒दा॒नम् । दक्ष॑म् । द॒धा॒तु । सु॒ऽम॒न॒स्यमान॑म् ॥२८.५॥

Mantra without Swara
भूमिष्ट्वा पातु हरितेन विश्वभृदग्निः पिपर्त्वयसा सजोषाः। वीरुद्भिष्टे अर्जुनं संविदानं दक्षं दधातु सुमनस्यमानम् ॥

भूमि: । त्वा । पातु। हरितेन । विश्वऽभृत् । अग्नि: । पिपर्तु । अयसा । सऽजोषा: । वीरुत्ऽभि: । ते । अर्जुनम् । सम्ऽविदानम् । दक्षम् । दधातु । सुऽमनस्यमानम् ॥२८.५॥

Meaning
१. (भूमि:) = निवास का साधनभूत [भवन्ति यस्मिन्] यह शरीर (त्वा) = तुझे (हरितेन) = अज्ञान के अपहरण के द्वारा (पातु) = सब प्रकार से रक्षित करे। इस मानव-शरीर को हम ज्ञान-प्राप्ति का मुख्य साधन समझें। २. (विश्वभूत्) = सबका भरण करनेवाला (अग्निः) = अग्रितत्त्व (सजोषाः) = तेरे साथ प्रीतिपूर्वक कर्तव्यकर्मों का सेवन करता हुआ (अयसा) = लोहवत् दुद शरीर से (पिपर्त) = तेरा पालन करे। अग्नितत्व के ठीक होने से हमारे शरीर दृढ़ हों और हम सब कर्तव्यकर्मों को करनेवाले बनें। ३. (वीरुद्धिः) = लता-वनस्पतियों से-वानस्पतिक पदार्थों का सेवन करता हुआ (संविदानम्) = मेलवाला होता हुआ (ते) = तेरा यह (अर्जुनम्) = [रजतम्] चैदीला राजततत्त्व (सुमनस्य-मानम्) = उत्तम सौमनस्य से युक्त (दक्षम्) = बल को (दधातु) = धारण करे।
Essence
इस मानव-शरीर में ज्ञान-प्राप्ति को हम अपना मुख्य कर्तव्य समझें। अग्नितत्व से सब कर्मों में प्रेरित होते हुए हम सुदृढ़ शरीर हों तथा उचित राजतत्व हमें प्रसन्नतायुक्त बलवाला बनाए।
Subject
हरित, अयस्, अर्जुन

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