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Atharvaveda - Mantra 14

Atharvaveda 5/28/14

31 Sukta
14 Mantra
5/28/14
Devata- अग्न्यादयः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- दीर्घायु सूक्त
Mantra with Swara
घृ॒तादुल्लु॑प्तं॒ मधु॑ना॒ सम॑क्तं भूमिदृं॒हमच्यु॑तं पारयि॒ष्णु। भि॒न्दन्त्स॒पत्ना॒नध॑रांश्च कृ॒ण्वदा मा॑ रोह मह॒ते सौभ॑गाय ॥

घृ॒तात्। उत्ऽलु॑प्तम् । मधु॑ना । सम्ऽअ॑क्तम् । भू॒मि॒ऽदृं॒हम् । अच्यु॑तम् । पा॒र॒यि॒ष्णु । भि॒न्दत् । स॒ऽपत्ना॑न् । अध॑रान् । च॒ । कृ॒ण्वत् । आ । मा॒ । रो॒ह॒ । म॒ह॒ते । सौभ॑गाय ॥२८.१४॥

Mantra without Swara
घृतादुल्लुप्तं मधुना समक्तं भूमिदृंहमच्युतं पारयिष्णु। भिन्दन्त्सपत्नानधरांश्च कृण्वदा मा रोह महते सौभगाय ॥

घृतात्। उत्ऽलुप्तम् । मधुना । सम्ऽअक्तम् । भूमिऽदृंहम् । अच्युतम् । पारयिष्णु । भिन्दत् । सऽपत्नान् । अधरान् । च । कृण्वत् । आ । मा । रोह । महते । सौभगाय ॥२८.१४॥

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Meaning
१. गतमन्त्र में वर्णित 'तेजस्' को सम्बोधित करते हुए साधक कहता है कि यह तेजस् (घृतात्) = दीसि-ज्ञानदीप्ति के हेतु से (उत् लुसम्) = ऊर्ध्वगतिवाला किया जाकर अदृष्ट किया जाता है। वीर्य की ऊर्ध्व गति करनेवाला 'ऊर्ध्वरेतस्' पुरुष अपनी ज्ञानाग्नि को दीप्त करनेवाला होता है। यह वीर्य (मधना) = माधुर्य के हेतु से (समक्तम्) = शरीर में संगत किया गया है। सुरक्षित हुआ हुआ वीर्य जीवन को मधुर बनाता है। (भूमिदृहम्) = यह शरीररूप भूमि को दृढ़ बनाता है, (अच्युतम्) = हमें शरीर से च्युत नहीं होने देता, अर्थात् दीर्घजीवन का कारण बनता है। पारयिष्णु-हमें सब रोगों से पार ले-जानेवाला है। २. (सपत्नान्) = रोगरूप शत्रुओं को (भिन्दन) = विदीर्ण करता हुआ (च) = तथा (अधरान् कृण्वत्) = उन्हें पाव तले रौंदता हुआ हे वीर्य! तू (महते सौभगाय) = मेरे महान् सौभाग्य के लिए (मा आरोह) = मेरे शरीर में आरोहण कर-ऊर्ध्वगतिवाला हो। शरीर में सुरक्षित हुआ यह वीर्य हमारे सब प्रकार के उत्थान का कारण बनता है।
Essence
'ज्ञानदीति तथा माधुर्य' के हेतु से वीर्य को शरीर में सुरक्षित व ऊर्ध्वगतिवाला किया जाता है। यह शरीर को दृढ़ बनाता है, हमें सब रोगों से पार ले-जाता है, रोगरूप शत्रुओं को कुचलता हुआ यह हमारे महान् सौभाग्य के लिए हो।
Subject
घृतादुल्लुस मधुना समक्तम्
Special
वीर्यरक्षा द्वारा रोगरूप शत्रुओं का विनाश करनेवाला व्यक्ति 'चातन' बनता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है -