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Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 5/28/11

31 Sukta
14 Mantra
5/28/11
Devata- अग्न्यादयः Rishi- अथर्वा Chhanda- पञ्चपदातिशक्वरी Suktam- दीर्घायु सूक्त
Mantra with Swara
पुरं॑ दे॒वाना॑म॒मृतं॒ हिर॑ण्यं॒ य आ॑बे॒धे प्र॑थ॒मो दे॒वो अग्रे॑। तस्मै॒ नमो॒ दश॒ प्राचीः॑ कृणो॒म्यनु॑ मन्यतां त्रि॒वृदा॒बधे॑ मे ॥

पुर॑म् । दे॒वाना॑म् । अ॒मृतम् । हिर॑ण्यम् । य: । आ॒ऽवे॒धे । प्र॒थ॒म: । दे॒व: । अग्रे॑ । तस्मै॑ । नम॑: । दश॑ । प्राची॑: । कृ॒णो॒मि॒ । अनु॑ । म॒न्य॒ता॒म् । त्रि॒ऽवृत् । आ॒ऽवधे॑ । मे॒ ॥२८.११॥

Mantra without Swara
पुरं देवानाममृतं हिरण्यं य आबेधे प्रथमो देवो अग्रे। तस्मै नमो दश प्राचीः कृणोम्यनु मन्यतां त्रिवृदाबधे मे ॥

पुरम् । देवानाम् । अमृतम् । हिरण्यम् । य: । आऽवेधे । प्रथम: । देव: । अग्रे । तस्मै । नम: । दश । प्राची: । कृणोमि । अनु । मन्यताम् । त्रिऽवृत् । आऽवधे । मे ॥२८.११॥

Meaning
१. (देवानाम्) = देववृत्तिवाले व्यक्तियों का (पुरम्) = यह अग्र-गमन (हिरण्यम्) = हितरमणीय है ज्योतिर्मय है। यह (अमृतम्) = हमें नीरोग बनानेवाला है। (य:) = जो भी इस अग्र-गमन को आबेधे-अपने में बाँधता है, वह प्रथम:-प्रथम होता है-ब्रह्मा बनता है [ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव], (देव:) = देव होता है, (अग्ने) = आगे-और-आगे बढ़ता है। २. (तस्मै) = उस 'उग्न गतिवाले प्रथम देव' के लिए (नमः) = नमस्कार हो। मैं भी (दश) = दसों इन्द्रियों को (प्राची) = [प्र अञ्ब] अग्रगतिवाला (कृणोमि) = करता है। (त्रिवृत्) = 'हरित, अर्जुन [रजत] व अयस्' में विष्ठित इन्द्रिय-त्रिक के (आबधे) = समन्तात् बन्धन में, वशीकरण में में (अनुमन्यताम्) = मुझे अनुमति देनेवाला हो-मैं इन सब इन्द्रियों को वश में कर सकूँ।
Essence
इन्द्रियों को वश में करके हम देवों की भाँति अग्रगतिवाले हों। उन देवों का हम आदर करें और स्वयं भी इन्द्रियों को संयत करनेवाले हों।
Subject
इन्द्रिय-संयम

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