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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 5/27/6

31 Sukta
12 Mantra
5/27/6
Devata- इळा, सरस्वती, भारती Rishi- ब्रह्मा Chhanda- द्विपदा विराड्गायत्री Suktam- अग्नि सूक्त
Mantra with Swara
त॒री म॒न्द्रासु॑ प्र॒यक्षु॒ वस॑व॒श्चाति॑ष्ठन्वसु॒धात॑रश्च ॥

त॒री । म॒न्द्रासु॑ । प्र॒ऽयक्षु॑ । वस॑व: । च॒ । अति॑ष्ठन् । व॒सु॒ऽधात॑र: । च॒ ॥२७.६॥

Mantra without Swara
तरी मन्द्रासु प्रयक्षु वसवश्चातिष्ठन्वसुधातरश्च ॥

तरी । मन्द्रासु । प्रऽयक्षु । वसव: । च । अतिष्ठन् । वसुऽधातर: । च ॥२७.६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (तरी) = संसार-सागर को तैरनेवाला वह होता है जोकि (मन्द्रासु) = आनन्द की साधनभूत क्रियाओं में-किन्हीं भी आनन्द के अवसरों पर (प्रयक्षु) = उस प्रभु के पूजन की कामनावाला होता है-प्रभु का यजन करता है। २. यह (वसुधा-तर: च) = वसुओं को धारण करनेवाली पृथिवी को तैर जानेवाले-पार्थिव भोगों से ऊपर उठ जानेवाले और (वसवः च) = अपने निवास को उत्तम बनानेवाले लोग (अतिष्ठन्) = प्रभु में स्थित होते हैं।
Essence
संसार-सागर को तैर जानेवाला व्यक्ति वह है जोकि आनन्द के अवसरों पर प्रभु का पूजन करता है। पार्थिव भोगों से ऊपर उठनेवाले व अपने निवास को उत्तम बनानेवाले ये लोग ही प्रभु में स्थित होते हैं।
Subject
वसुधा-तरः, वसवः च