Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 5/27/11

31 Sukta
12 Mantra
5/27/11
Devata- इळा, सरस्वती, भारती Rishi- ब्रह्मा Chhanda- षट्पदानुष्टुब्गर्भा परातिजगती Suktam- अग्नि सूक्त
Mantra with Swara
वन॑स्प॒तेऽव॑ सृजा॒ ररा॑णः। त्मना॑ दे॒वेभ्यो॑ अ॒ग्निर्ह॒व्यं श॑मि॒ता स्व॑दयतु ॥

वन॑स्पते । अव॑ । सृ॒ज॒ । ररा॑ण: । त्मना॑ । दे॒वेभ्य॑: । अ॒ग्नि: । ह॒व्यम् । श॒मि॒ता । स्व॒द॒य॒तु॒ ॥२७.११॥

Mantra without Swara
वनस्पतेऽव सृजा रराणः। त्मना देवेभ्यो अग्निर्हव्यं शमिता स्वदयतु ॥

वनस्पते । अव । सृज । रराण: । त्मना । देवेभ्य: । अग्नि: । हव्यम् । शमिता । स्वदयतु ॥२७.११॥

Meaning
१. गतमन्त्र के अनुसार प्रभु धन प्राप्त कराते हैं। धन प्रास कराके स्तोता को प्रेरणा देते हैं कि हे वनस्पते-सम्भजनीय धन के रक्षक [Trustee]![धन तो प्रभु का है, तो उसका रक्षक है], स्तोत: ! तु देवेभ्यः त्मना रराण: देवों के लिए स्वयं इस धन को देता हुआ अवसूज-इस धन के बन्धन को छोड़। दान ही तुझे इस धन के बन्धन से मुक्त करेगा। २. साथ ही शमिता अग्नि:-सब रोगों को शान्त करनेवाला यह यज्ञ का अग्नि हव्यं स्वदयतु-हव्य पदार्थों का स्वाद ले, अर्थात् तू धन का विनियोग यज्ञों में कर । ये यज्ञ तुझे नीरोग भी बनाएँगे और धन का बन्धन भी छूटेगा।
Essence
यदि हम धनार्जन करके इस धन को देवों के लिए स्वयं देते रहेंगे और इस धन द्वारा यज्ञों को करते रहेंगे तो धन के बन्धन में न फैंसेंगे।
Subject
देवों के लिए दान व यज्ञ

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.