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Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 5/26/11

31 Sukta
12 Mantra
5/26/11
Devata- इन्द्रः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- द्विपदा प्राजापत्या बृहती Suktam- नवशाला सूक्त
Mantra with Swara
इन्द्रो॑ युनक्तु बहु॒धा पयां॑स्य॒स्मिन्य॒ज्ञे सु॒युजः॒ स्वाहा॑ ॥

इन्द्र॑: । यु॒न॒क्तु॒ । ब॒हु॒ऽधा । वी॒र्या᳡णि । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे। सु॒ऽयुज॑: । स्वाहा॑ ॥२६.११॥

Mantra without Swara
इन्द्रो युनक्तु बहुधा पयांस्यस्मिन्यज्ञे सुयुजः स्वाहा ॥

इन्द्र: । युनक्तु । बहुऽधा । वीर्याणि । अस्मिन् । यज्ञे। सुऽयुज: । स्वाहा ॥२६.११॥

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Meaning
१. (सयुज:) = उत्तम कर्मों में प्रेरित करनेवाला (इन्द्रः) = शत्रुविद्रावक प्रभु (अस्मिन् यज्ञे) = इस जीवन-यज्ञ में (बहुधा) = बहुत प्रकार से (वीर्याणि) = वीर्यों को (युनक्तु) = हमारे साथ जोड़े। (स्वाहा) = हम उस इन्द्र के प्रति अपना समर्पण करते हैं।
Essence
हम जितेन्द्रिय बनते हुए वीर्य को अपने में सुरक्षित रक्खें।
Subject
वीर्याणि
Information
गतमन्त्र में 'सोमः, पयांसि' शब्दों का प्रयोग संकेत करता है कि हम सौम्य भोजन ही करें। इस मन्त्र का 'इन्द्र: 'जितेन्द्रियता का द्योतक है। एवं, वीर्य-रक्षा के लिए 'सौम्य जीवन व जितेन्द्रियता' प्रमुख साधन हैं।