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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 5/25/7

31 Sukta
13 Mantra
5/25/7
Devata- योनिः, गर्भः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- गर्भाधान सूक्त
Mantra with Swara
गर्भो॑ अ॒स्योष॑धीनां॒ गर्भो॒ वन॒स्पती॑नाम्। गर्भो॒ विश्व॑स्य भू॒तस्य॒ सो अ॑ग्ने॒ गर्भ॒मेह धाः॑ ॥

गर्भ॑: । अ॒सि॒ । ओष॑धीनाम् । गर्भ॑: । वन॒स्पती॑नाम् । गर्भ॑: । विश्व॑स्य । भू॒तस्य॑ । स: । अ॒ग्ने॒ । गर्भ॑म् । आ । इ॒ह ।धा॒: ॥२५.७॥

Mantra without Swara
गर्भो अस्योषधीनां गर्भो वनस्पतीनाम्। गर्भो विश्वस्य भूतस्य सो अग्ने गर्भमेह धाः ॥

गर्भ: । असि । ओषधीनाम् । गर्भ: । वनस्पतीनाम् । गर्भ: । विश्वस्य । भूतस्य । स: । अग्ने । गर्भम् । आ । इह ।धा: ॥२५.७॥

Meaning
१. हे (अग्ने) = तेजस्विन प्रभो ! आप (ओषधीनां गर्भ: असि) = फलपाकान्त सब ओषधियों के गर्भ हैं। सब ओषधियों में अग्नितत्त्व के रूप में प्रभु का निवास है। (वनस्पतीनाम्) = वनस्पतियों के आप (गर्भ:) = गर्भ हैं। वनस्पतियों में भी अग्निरूप से प्रभु विद्यमान हैं। (विश्वस्य भूतस्य) = सब भूतों के (गर्भ:) = आप गर्भ हैं-सब प्राणियों में अग्नितत्व की स्थिति है। यही उनके जीवन का कारण है। २.हे अने। तू (सः) = वह (इह) = इस 'देवी सरस्वती' में (गर्भ आधा:) = गर्भ का धारण कर। माता में उचित अग्नितत्त्व होने पर ही गर्भ की स्थिति होती है, निर्बला स्त्री में गर्भ की स्थिति नहीं हो पाती।
Essence
ओषधियों, वनस्पतियों व सब भूतों में अग्नितत्त्व की स्थिति है। माता में भी यह अग्नितत्त्व ही गर्भ का धारण करता है, निर्बला स्त्री के शरीर में गर्भ स्थिर नहीं हो पाता।
Subject
गर्भस्थिति में अग्नितत्व का महत्व

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