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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 5/23/10

31 Sukta
13 Mantra
5/23/10
Devata- इन्द्रः Rishi- कण्वः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कृमिघ्न सूक्त
Mantra with Swara
अ॑त्रि॒वद्वः॑ क्रिमयो हन्मि कण्व॒वज्ज॑मदग्नि॒वत्। अ॒गस्त्य॑स्य॒ ब्रह्म॑णा॒ सं पि॑नष्म्य॒हं क्रिमी॑न् ॥

अ॒त्त्रि॒ऽवत् । व॒: । क्रि॒म॒य॒: । ह॒न्मि॒ । क॒ण्व॒ऽवत् । ज॒म॒द॒ग्नि॒ऽवत् । अ॒गस्त्य॑स्य । ब्रह्म॑णा । सम् । पि॒न॒ष्मि॒ । अ॒हम् । क्रिमी॑न् ॥२३.१०॥

Mantra without Swara
अत्रिवद्वः क्रिमयो हन्मि कण्ववज्जमदग्निवत्। अगस्त्यस्य ब्रह्मणा सं पिनष्म्यहं क्रिमीन् ॥

अत्त्रिऽवत् । व: । क्रिमय: । हन्मि । कण्वऽवत् । जमदग्निऽवत् । अगस्त्यस्य । ब्रह्मणा । सम् । पिनष्मि । अहम् । क्रिमीन् ॥२३.१०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (क्रिमय:) = कृमयो! (व:) = तुम्हें मैं इसप्रकार (हन्मि) = नष्ट करता हूँ (अत्रिवत्) = जैसेकि एक (अत्रि) = काम, क्रोध व लोभ से ऊपर उठा हुआ पुरुष नष्ट करता है [अ-त्रि], (कण्ववत्) = एक मेधावी की भाँति तुम्हें नष्ट करता हूँ और (जमदग्निवत्) = दीप्त जाठर अनिवाले [जमत अग्नि] पुरुष की भाँति तुम्हारा विनाश करता हूँ। काम-क्रोध व लोभ में फंसने से, नासमझी से, आहार विहार की गलतियों से व जाठर अग्नि के मन्द हो जाने से विविध रोग-कृमियों की उत्पत्ति हो जाती है। २. (अगस्त्यस्य) = [अगं स्त्यायति, संघाते] पाप का संहनन करनेवाले पुरुष के (ब्रह्मणा) = ज्ञान से (अहम्) = मैं (क्रिमीन् संपिनष्मि) = कृमियों को पीस डालता हूँ-विनष्ट कर डालता हूँ।
Essence
हम 'अत्रि, कण्व, जमदग्नि व अगस्त्य' बनें और इन रोगकृमियों के शिकार न हों।
Subject
'अत्रि, कण्व, जमदग्नि व अगस्त्य' की भाँति