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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 5/22/4

31 Sukta
14 Mantra
5/22/4
Devata- तक्मनाशनः Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- तक्मनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अ॑ध॒राञ्चं॒ प्र हि॑णो॒मि नमः॑ कृ॒त्वा त॒क्मने॑। श॑कम्भ॒रस्य॑ मुष्टि॒हा पुन॑रेतु महावृ॒षान् ॥

अ॒ध॒राञ्च॑म् । प्र । हि॒नो॒मि॒ । नम॑: । कृ॒त्वा । त॒क्मने॑ । श॒क॒म्ऽभ॒रस्य॑ । मु॒ष्टि॒ऽहा । पुन॑: । ए॒तु॒ । म॒हा॒ऽवृ॒षान् ॥२२.४॥

Mantra without Swara
अधराञ्चं प्र हिणोमि नमः कृत्वा तक्मने। शकम्भरस्य मुष्टिहा पुनरेतु महावृषान् ॥

अधराञ्चम् । प्र । हिनोमि । नम: । कृत्वा । तक्मने । शकम्ऽभरस्य । मुष्टिऽहा । पुन: । एतु । महाऽवृषान् ॥२२.४॥

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Meaning
१. इस (तक्मने) = ज्वर के लिए (नमः कृत्वा) = नमस्कार करके (अधराञ्चं प्रहिणोमि) = इसे नीचे की ओर गतिवाला करके दूर भेज देता हूँ। २. (शकम्भरस्य) = अपने में शक्ति का भरण करनेवाले का भी-शक्तिशाली का भी (मुष्टिहा) = [मुष स्तेये] शक्तिशोषण के द्वारा विनाश करनेवाला यह ज्वर (पुन:) = फिर (महावृषान् एतु) = बहुत अधिक वृष्टिवाले देशों में जाए।
Essence
ज्वर को दूर से ही नमस्कार करना ठीक है। इसे विरेचक ओषधि द्वारा निम्नगतिवाला करना चाहिए। यह शक्तिशाली को भी निस्तेज करके नष्ट कर देता है।

अतिवृष्टिवाले देशों में यह फिर-फिर उत्पन्न हो जाता है।
Subject
शकम्भरस्य मुष्टिहा