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Atharvaveda - Mantra 12

Atharvaveda 5/21/12

31 Sukta
12 Mantra
5/21/12
Devata- वानस्पत्यो दुन्दुभिः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिपदा यवमध्या गायत्री Suktam- शत्रुसेनात्रासन सूक्त
Mantra with Swara
ए॒ता दे॑वसे॒नाः सूर्य॑केतवः॒ सचे॑तसः। अ॒मित्रा॑न्नो जयन्तु॒ स्वाहा॑ ॥

ए॒ता:। दे॒व॒ऽसे॒ना: । सूर्य॑ऽकेतव: । सऽचे॑तस: । अ॒मित्रा॑न् । न: । ज॒य॒न्तु॒ । स्वाहा॑ ॥२१.१२॥

Mantra without Swara
एता देवसेनाः सूर्यकेतवः सचेतसः। अमित्रान्नो जयन्तु स्वाहा ॥

एता:। देवऽसेना: । सूर्यऽकेतव: । सऽचेतस: । अमित्रान् । न: । जयन्तु । स्वाहा ॥२१.१२॥

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Meaning
१. (एता:) = ये (न:) = हमारी (देवसेना:) = शत्रुओं को जीतने की कामनावाली सेनाएँ (सूर्यकेतवः) = सूर्य के झण्डेवाली हों। सूर्य से ये निरन्तर प्रेरणा प्राप्त करें कि "जैसे सूर्य अन्धकार को नष्ट करता है, हमें शत्रुओं के अन्धकार को नष्ट करना है". ये (सचेतसः) = सदा चेतना से युक्त हों-इनके होश सदा स्थिर रहें-ये घबरा न जाएँ। २. ये सेनाएँ (अमित्रान् जयन्तु) = शत्रुओं को जीतनेवाली हों। (स्वाहा) = हम भी अपना त्याग करनेवाले बनें [स्व+हा], राष्ट्र-रक्षा के लिए कुछ-न-कुछ बलिदान करनेवाले बनें।
Essence
हमारी सेनाएँ विजिगीषावाली हों। इनके झण्डे पर सूर्य का चिह्न हो। उससे ये शत्ररूप अन्धकार को समास करने की प्रेरणा लें। ये शत्रुओं को जीतें। हम भी स्वार्थ-त्याग की वृत्ति से राष्ट्र-रक्षा में सहयोगी बनें।
Subject
देवसेना सूर्य केतवः
Special
सुरक्षित राष्ट्र में उन्नति-पथ पर चलता हुआ व्यक्ति अपने को ज्ञानाग्नि में परिपक्व करके 'भृगु' बनता है। शरीर को स्वस्थ बनानेवाला यह अङ्गिरा होता है। अगला सूक्त इसी 'भृगु अङ्गिरा' का है।