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Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 5/20/8

31 Sukta
12 Mantra
5/20/8
Devata- वानस्पत्यो दुन्दुभिः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- शत्रुसेनात्रासन सूक्त
Mantra with Swara
धी॒भिः कृ॒तः प्र व॑दाति॒ वाच॒मुद्ध॑र्षय॒ सत्व॑ना॒मायु॑धानि। इन्द्र॑मेदी॒ सत्व॑नो॒ नि ह्व॑यस्व मि॒त्रैर॒मित्राँ॒ अव॑ जङ्घनीहि ॥

धी॒भि: । कृ॒त: । प्र । व॒दा॒ति॒ । वाच॑म् । उत् । ह॒र्ष॒य॒ । सत्व॑नाम् । आयु॑धानि । इन्द्र॑ऽमेदी । सत्व॑न: । नि । ह्व॒य॒स्व॒ । मि॒त्रै: । अ॒मित्रा॑न् । अव॑ । ज॒ङ्घ॒नी॒हि॒ ॥२०.८॥

Mantra without Swara
धीभिः कृतः प्र वदाति वाचमुद्धर्षय सत्वनामायुधानि। इन्द्रमेदी सत्वनो नि ह्वयस्व मित्रैरमित्राँ अव जङ्घनीहि ॥

धीभि: । कृत: । प्र । वदाति । वाचम् । उत् । हर्षय । सत्वनाम् । आयुधानि । इन्द्रऽमेदी । सत्वन: । नि । ह्वयस्व । मित्रै: । अमित्रान् । अव । जङ्घनीहि ॥२०.८॥

Meaning
१, (धीभिः कृतः) = बुद्धिपूर्वक बनाया हुआ-बुद्धिमान् शिल्पियों द्वारा निर्मित यह युद्धवाध (वाचं प्रवदाति) = ऊँचा शब्द करता है। हे युद्धवाद्य! तू (सत्वनाम्) = वीरों के (आयुधानि) = आयुधों को (उद्धर्षय) = ऊँचा उठा। तेरे शब्द से उत्साहित होकर वे अपने-अपने शस्त्रों को उठाएँ। २. (इन्द्रमेदी) = वीरों के साथ स्नेह करनेवाला तू (सत्वनः नियस्व) = वीर सैनिकों को युद्ध के लिए पुकार । (मित्रैः अमित्रान् अवजंघनीहि) = मित्रों के द्वारा अमित्रों को तू सुदूर भगानेवाला व उन्हें नष्ट करनेवाला हो।
Essence
कुशल शिल्पियों से बनाया हुआ यह युद्धवाद्य ऊँचा शब्द करता है। इसके शब्द को सुनकर वीर सैनिक अस्त्रों को उठाते हैं और शत्रुओं को दूर भगाने व नष्ट करनेवाले होते हैं।
Subject
इन्द्रमेदी

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