Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 5/19/4

31 Sukta
15 Mantra
5/19/4
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- मयोभूः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
ब्र॑ह्मग॒वी प॒च्यमा॑ना॒ याव॒त्साभि वि॒जङ्ग॑हे। तेजो॑ रा॒ष्ट्रस्य॒ निर्ह॑न्ति॒ न वी॒रो जा॑यते॒ वृषा॑ ॥

ब्र॒ह्म॒ऽग॒वी । प॒च्यमा॑ना । याव॑त् । सा । अ॒भि । वि॒ऽजङ्ग॑हे । तेज॑: । रा॒ष्ट्रस्य॑ । नि: । ह॒न्ति॒ । न । वी॒र: । जा॒य॒ते॒ । वृषा॑ ॥१९.४॥

Mantra without Swara
ब्रह्मगवी पच्यमाना यावत्साभि विजङ्गहे। तेजो राष्ट्रस्य निर्हन्ति न वीरो जायते वृषा ॥

ब्रह्मऽगवी । पच्यमाना । यावत् । सा । अभि । विऽजङ्गहे । तेज: । राष्ट्रस्य । नि: । हन्ति । न । वीर: । जायते । वृषा ॥१९.४॥

Meaning
१. (यावत्) = जब तक (सा ब्रह्मगवी) = वह ब्राह्मण की (गौ पच्यमाना) = कष्टों की अग्नि में तपाई जाती हुई (अभिविजङ्गहे) = तड़पती रहती है, अर्थात् जब तक ब्राह्मण की वाणी का आदर नहीं होता तब तक यह निरादृत ब्रह्मगवी (राष्ट्रस्य तेजः निहन्ति) = राष्ट्र के तेज को नष्ट कर देती है। इस राष्ट्र में (वीर: वृषा न जायते) = वीर धार्मिक पुरुषों का प्रादुर्भाव [विकास] नहीं होता।
Essence
ब्राह्मण की वाणी पर प्रतिबन्ध लगे रहने पर ज्ञान के प्रसार के अभाव में अधर्म फैलता है, राष्ट्र में तेजस्विता नहीं रहती और धार्मिक वीर पुरुषों का प्रादुर्भाव नहीं होता।
Subject
'वृषा वीरः' न जायते

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.