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Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 5/18/8

31 Sukta
15 Mantra
5/18/8
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- मयोभूः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
जि॒ह्वा ज्या भव॑ति॒ कुल्म॑लं॒ वाङ्ना॑डी॒का दन्ता॒स्तप॑सा॒भिदि॑ग्धाः। तेभि॑र्ब्र॒ह्मा वि॑ध्यति देवपी॒यून् हृ॑द्ब॒लैर्धनु॑र्भिर्दे॒वजू॑तैः ॥

जि॒ह्वा । ज्या । भव॑ति । कुल्म॑लम् । वाक् । ना॒डी॒का: । दन्ता॑: । तप॑सा । अ॒भिऽदि॑ग्धा: । तेभि॑: । ब्र॒ह्मा । वि॒ध्य॒ति॒ । दे॒व॒ऽपी॒यून् । हृ॒त्ऽब॒लै: । धनु॑:ऽभि: । दे॒वऽजू॑तै: ॥१८.८॥

Mantra without Swara
जिह्वा ज्या भवति कुल्मलं वाङ्नाडीका दन्तास्तपसाभिदिग्धाः। तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देवपीयून् हृद्बलैर्धनुर्भिर्देवजूतैः ॥

जिह्वा । ज्या । भवति । कुल्मलम् । वाक् । नाडीका: । दन्ता: । तपसा । अभिऽदिग्धा: । तेभि: । ब्रह्मा । विध्यति । देवऽपीयून् । हृत्ऽबलै: । धनु:ऽभि: । देवऽजूतै: ॥१८.८॥

Meaning
१. ब्राह्मण की (जिह्वा) = जीभ (ज्या भवति) = धनुष की डोरी होती है, (वाक) = वाणी (कुल्मलम्) = धनुष का दण्ड हो जाती है और (तपसा अभिदिग्धाः) = तप व तेज से लिस (दन्ताः) = दाँत (नाडीका:) = 'नालीक' नामक बाण हो जाते हैं [न अलीक-न झूठे, अर्थात् शत्रु को अवश्य नष्ट करनेवाले]। २. (तेभि:) = उनके द्वारा (ब्रह्मा) = यह ज्ञानी (देवपीयून) = देवहिंसक राजाओं को (विध्यति) = बींधता है-नष्ट करता है, उन (धनुर्भि:) = धनुषों से बींधता है, जोकि (हृदबलैः) = हृदय की शक्ति से युक्त है तथा (दैवजूतैः) = दिव्य शक्तियों से प्रेरित हैं।
Essence
तपस्वी, ज्ञानी ब्राह्मण की वाणी शत्रुवेधक शर के समान होती है। हृदय की शक्ति से सम्पन्न, दिव्यभाव से प्रेरित यह शर देवहिंसक राजा को विद्ध करता है।
Subject
ब्रह्मा द्वारा देवपीयुओं का वेधन

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