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Atharvaveda - Mantra 13

Atharvaveda 5/18/13

31 Sukta
15 Mantra
5/18/13
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- मयोभूः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
दे॑वपी॒युश्च॑रति॒ मर्त्ये॑षु गरगी॒र्णो भ॑व॒त्यस्थि॑भूयान्। यो ब्रा॑ह्म॒णं दे॒वब॑न्धुं हि॒नस्ति॒ न स पि॑तृ॒याण॒मप्ये॑ति लो॒कम् ॥

दे॒व॒ऽपी॒यु: । च॒र॒ति॒ । मर्त्ये॑षु । ग॒र॒ऽगी॒र्ण: । भ॒व॒ति॒ । अस्थि॑ऽभूयान् । य: । ब्र॒ह्मा॒णम् । दे॒वऽब॑न्धुम् । हि॒नस्ति॑ । न । स: । पि॒तृ॒ऽयान॑म् । अपि॑ । ए॒ति॒ । लो॒कम् ॥१८.१३॥

Mantra without Swara
देवपीयुश्चरति मर्त्येषु गरगीर्णो भवत्यस्थिभूयान्। यो ब्राह्मणं देवबन्धुं हिनस्ति न स पितृयाणमप्येति लोकम् ॥

देवऽपीयु: । चरति । मर्त्येषु । गरऽगीर्ण: । भवति । अस्थिऽभूयान् । य: । ब्रह्माणम् । देवऽबन्धुम् । हिनस्ति । न । स: । पितृऽयानम् । अपि । एति । लोकम् ॥१८.१३॥

Meaning
१. (देवपीयुः) = देवों-ज्ञानियों का हिंसन करनेवाला राजा (मर्त्येषु) = मनुष्यों में (गरगीर्णः चरति) = मानो विष पिये हुए घूमता है, अर्थात् उसकी अवस्था वही हो जाती है, जो उस पुरुष की, जिसने कि ग़लती से विष पी लिया हो। यह (अस्थिभूयान् भवति) = हड्डी-हड्डीवाला हो जाता है-अस्थि-पंजर-सा रह जाता है। २. (यः) = जो (देवबन्धुम्) =  प्रभु के मित्र (ब्राह्मणम्) = ज्ञानी पुरुष का (हिनस्ति) = हिंसन करता है, सः वह राजा देवयानलोक को प्राप्त करने की बात तो दूर रही (पितृयाणं लोकं अपि न एति) =  पितृयाणलोक को भी प्राप्त नहीं करता। यदि यह प्रजा का रक्षण करता तभी तो पितृयाणलोक को प्राप्त करता। ब्राह्मणी प्रजा का हिंसन करने से इसके लिए इस लोक की प्राप्ति सम्भव कहाँ? यह तो विनष्ट ही होता है।
Essence
जो राजा देवों का हिंसन करता है, वह विष पिये हुए के समान अस्थि-पंजर सा रह जाता है, इसे उत्तम लोक की प्राप्ति नहीं होती।
Subject
गरगीर्ण: अस्थिभूयान्

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