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Atharvaveda - Mantra 12

Atharvaveda 5/18/12

31 Sukta
15 Mantra
5/18/12
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- मयोभूः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
एक॑शतं॒ ता ज॒नता॒ या भूमि॒र्व्य॑धूनुत। प्र॒जां हिं॑सि॒त्वा ब्राह्म॑णीमसंभ॒व्यं परा॑भवन् ॥

एक॑ऽशतम् । ता: । ज॒नता॑: । या: । भूमि॑: । विऽअ॑धूनुत । प्र॒ऽजाम् । हिं॒सि॒त्वा । ब्राह्म॑णीम् । अ॒स॒म्ऽभ॒व्यम् ।परा॑ । अ॒भ॒व॒न् ॥१८.१२॥

Mantra without Swara
एकशतं ता जनता या भूमिर्व्यधूनुत। प्रजां हिंसित्वा ब्राह्मणीमसंभव्यं पराभवन् ॥

एकऽशतम् । ता: । जनता: । या: । भूमि: । विऽअधूनुत । प्रऽजाम् । हिंसित्वा । ब्राह्मणीम् । असम्ऽभव्यम् ।परा । अभवन् ॥१८.१२॥

Meaning
१. (ताः जनता:) = वे लोग (एकशतम) = एक सौ एक थे-सैकड़ों थे (याः भूमिः व्यधूनुत)-जिन्हें भूमि ने कम्पित कर दिया। (ब्राह्मणीम्) = ज्ञानी पुरुष के पीछे चलनेवाली (प्रजा हिंसित्वा) = प्रजा को नष्ट करके ये प्रजापीड़क राजा (असंभव्यं पराभवम्) = बिना सम्भावना के ही परास्त हो गये। २. जब राजा प्रजा पर अत्याचार करने लगता है तब प्रजा किसी ज्ञानी की शरण में जाती है और वस्तुत: उस ज्ञानी की ही हो जाती है। इस प्रजा पर राजा खूब अत्याचार करता है, परन्तु अन्त में न जाने कैसे, उस प्रभु की व्यवस्था से वह नष्ट हो जाता है। कल्पना भी नहीं होती कि यह विनष्ट हो जाएगा, परन्तु वह ऐसे नष्ट हो जाता है, जैसे भूकम्प से एक महल नष्ट हो जाता है। कितने ही ऐसे अत्याचारियों को पृथिवी ने अन्ततः कम्पित कर दिया।
Essence
ब्राह्मणी प्रजा पर अत्याचार करके राजा कल्पनातीत ढंग से विनष्ट हो जाता है।
Subject
ब्राह्मणी प्रजा के हिंसन का परिणाम

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