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Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 5/18/11

31 Sukta
15 Mantra
5/18/11
Devata- ब्रह्मगवी Rishi- मयोभूः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ब्रह्मगवी सूक्त
Mantra with Swara
गौरे॒व तान्ह॒न्यमा॑ना वैतह॒व्याँ अवा॑तिरत्। ये केस॑रप्राबन्धायाश्चर॒माजा॒मपे॑चिरन् ॥

गौ: । ए॒व । तान् । ह॒न्यमा॑ना । वै॒त॒ऽह॒व्यान् । अव॑ । अ॒ति॒र॒त् ।ये । केस॑रऽप्राबन्धाया: । च॒र॒म॒ऽअजा॑म् । अपे॑चिरन् ॥१८.११॥

Mantra without Swara
गौरेव तान्हन्यमाना वैतहव्याँ अवातिरत्। ये केसरप्राबन्धायाश्चरमाजामपेचिरन् ॥

गौ: । एव । तान् । हन्यमाना । वैतऽहव्यान् । अव । अतिरत् ।ये । केसरऽप्राबन्धाया: । चरमऽअजाम् । अपेचिरन् ॥१८.११॥

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Meaning
१. (गौः एव) = यह ब्राह्मण की ज्ञानरूप गौ ही (हन्यमाना) = मारी जाती हुई (तान् वैतहव्यान्) = उन कर-प्राप्त धनों को खा जानेवाले-अपने विलास में व्यय कर डालनेवाले राजाओं को (अवातिरत्) = मार डालती है। २. उन वैतहव्यों को यह वाणी नष्ट कर देती है, (ये) = जो (केसरप्रा-बन्धाया:) = [के+सर+प्र। अबन्धा] सुख-प्रसार के लिए बन्धनरहित, अर्थात् निश्चितरूप से सुख प्राप्त करानेवाली जानी ब्रह्मण की वाणी की (चरमाजाम्) = [चरमा अजा-गतिक्षेपणयोः] अन्तिम चेतावनी को भी (अपेचिरन्) = पचा डालते हैं-हजम कर जाते हैं, अर्थात् उसे भी नहीं सुनते।
Essence
जो प्रजा से दिये गये कर को विलास में व्यय करनेवाले राजा हैं और ज्ञानियों से दी गई चेतावनी की परवाह नहीं करते, वे अन्तत: विनष्ट हो जाते हैं।
Subject
केसरप्राबन्धा वाणी