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Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 5/17/8

31 Sukta
18 Mantra
5/17/8
Devata- ब्रह्मजाया Rishi- मयोभूः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ब्रह्मजाया सूक्त
Mantra with Swara
उ॒त यत्पत॑यो॒ दश॑ स्त्रि॒याः पूर्वे॒ अब्रा॑ह्मणाः। ब्र॒ह्मा चे॒द्धस्त॒मग्र॑ही॒त्स ए॒व पति॑रेक॒धा ॥

उ॒त । यत् । पत॑य: । दश॑ । स्त्रि॒या: । पूर्वे॑ । अब्रा॑ह्मणा: । ब्र॒ह्मा । च॒ । इत् । हस्त॑म् । अग्र॑हीत् । स: । ए॒व । पति॑: । ए॒क॒ऽधा॥१७.८॥

Mantra without Swara
उत यत्पतयो दश स्त्रियाः पूर्वे अब्राह्मणाः। ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत्स एव पतिरेकधा ॥

उत । यत् । पतय: । दश । स्त्रिया: । पूर्वे । अब्राह्मणा: । ब्रह्मा । च । इत् । हस्तम् । अग्रहीत् । स: । एव । पति: । एकऽधा॥१७.८॥

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Meaning
१. (उत) = चाहे (स्त्रिया:) = [स्त्यै शब्दे] इस शब्दात्मक वेदवाणीरूप ब्रह्मजाया के (यत्) = जो (पूर्वे) = पहले (दश) = दस भी (अब्राह्मणा:) = अज्ञानी (पतयः) = रक्षक हो, (चेत्) = यदि (ब्रह्मा) = ज्ञानी (हस्तम् अग्रहीत्) = इस वेदवाणी के हाथ को ग्रहण करता है तो (सः एव) = वही (एकधा) = मुख्यरूप से (पति:) = इसका रक्षक है। २. वेदवाणी के दस भी रक्षक यदि वे ज्ञानी नहीं है, तो इसका रक्षण इसप्रकार से नहीं कर सकते, जैसेकि एक ज्ञानी इसकी रक्षा करता है। वे अज्ञानी प्रथम तो इसका अध्ययन न करके इसपर पत्र-पुष्प ही चढ़ाते रहेंगे। पढेंगे भी तो ऊटपटौंग अर्थ कर बैठेंगे, अत: वेदवाणी का रक्षक तो वस्तुत: ज्ञानी ही है। अल्पश्रुत [अब्राह्मण]से तो यह वेदवाणी डरती ही है। ('बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति।')
Essence
वेदवाणी का रक्षण यही है कि हम ज्ञानी बनकर समझदारी से इसका अध्ययन करनेवाले बनें।
Subject
वेदवाणी का रक्षक 'ब्रह्मा'