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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 5/17/4

31 Sukta
18 Mantra
5/17/4
Devata- ब्रह्मजाया Rishi- मयोभूः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मजाया सूक्त
Mantra with Swara
यामा॒हुस्तार॑कै॒षा वि॑के॒शीति॑ दु॒च्छुनां॒ ग्राम॑मव॒पद्य॑मानाम्। सा ब्र॑ह्मजा॒या वि दु॑नोति रा॒ष्ट्रं यत्र॒ प्रापा॑दि श॒श उ॑ल्कु॒षीमा॑न् ॥

याम् । आ॒हु: । तार॑का । ए॒षा । वि॒ऽके॒शी । इति॑ । दु॒च्छु॒ना॑म्। ग्राम॑म् । अ॒व॒ऽपद्य॑मानाम् । सा । ब्र॒ह्म॒ऽजा॒या । वि । दु॒नो॒ति॒। रा॒ष्ट्रम् । यत्र॑ । प्र॒ऽअपा॑दि । श॒श: । उ॒ल्कु॒षीऽमा॑न् ॥१७.४॥

Mantra without Swara
यामाहुस्तारकैषा विकेशीति दुच्छुनां ग्राममवपद्यमानाम्। सा ब्रह्मजाया वि दुनोति राष्ट्रं यत्र प्रापादि शश उल्कुषीमान् ॥

याम् । आहु: । तारका । एषा । विऽकेशी । इति । दुच्छुनाम्। ग्रामम् । अवऽपद्यमानाम् । सा । ब्रह्मऽजाया । वि । दुनोति। राष्ट्रम् । यत्र । प्रऽअपादि । शश: । उल्कुषीऽमान् ॥१७.४॥

Meaning
(याम्) = जिस वेदवाणी को (आहुः) = कहते है कि (एषा तारका) = [तारका ज्योतिषि इति इत्वाभाव] यह तारनेवाली है, (विकेशी इति) = यह निश्चत से विशिष्ट प्रकाश की किरणोंवाली है, (दुच्छुनाम्) = दुःखों व दुर्गति के (ग्रामम्) = समूह को (अवपद्यमानाम्) = हमसे दूर करनेवाली है। (सा ब्रह्मजाया) = वह प्रभु से प्रादुर्भूत हुई वेदवाणी (राष्ट्रम्) = राष्ट्र को (विदुनोति) = सन्ताप-शून्य करती है। २. यह उस राष्ट्र को सन्ताप-शुन्य करती है (यत्र) = जहाँ कि (उल्कुषीमान्) = [उल्कुषी-fire] मशाल को हाथ में लिये हुए (शश:) = प्लुतगतिवाला-खूब क्रियाशील पुरुष (प्रापादि) = प्रकृष्ट गतिवाला होता है। यह ज्ञान के प्रकाश को सर्वत्र फैलाता हुआ लोगों को उत्साहित करता है और इसप्रकार राष्ट्र को जागरित करनेवाला होता है।
Essence
वेदवाणी हमें तारनेवाली है, विशिष्ट प्रकार की रश्मियों को प्राप्त करानेवाली है। दु:खों को दूर करनेवाली है। यह देववाणी उस राष्ट्र को सन्ताप-शून्य करती है, जहाँ उत्साही पुरुष इसके सन्देश को राष्ट्र में सर्वत्र सुनाते हैं।
Subject
तारका-विकेशी

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