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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 5/17/3

31 Sukta
18 Mantra
5/17/3
Devata- ब्रह्मजाया Rishi- मयोभूः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मजाया सूक्त
Mantra with Swara
हस्ते॑नै॒व ग्रा॒ह्य॑ आ॒धिर॑स्या ब्रह्मजा॒येति॒ चेदवो॑चत्। न दू॒ताय॑ प्र॒हेया॑ तस्थ ए॒षा तथा॑ रा॒ष्ट्रं गु॑पि॒तं क्ष॒त्रिय॑स्य ॥

हस्ते॑न । ए॒व । ग्रा॒ह्य᳡: । आ॒ऽधि: । अ॒स्या॒: । ब्र॒ह्म॒ऽजा॒या । इति॑ । च॒ । इत् । अवो॑चत् । न । दू॒ताय॑ । प्र॒ऽहेया॑ । त॒स्थे॒ । ए॒षा । तथा॑ । रा॒ष्ट्रम् । गु॒पि॒तम् । क्ष॒त्रिय॑स्य ॥१७.३॥

Mantra without Swara
हस्तेनैव ग्राह्य आधिरस्या ब्रह्मजायेति चेदवोचत्। न दूताय प्रहेया तस्थ एषा तथा राष्ट्रं गुपितं क्षत्रियस्य ॥

हस्तेन । एव । ग्राह्य: । आऽधि: । अस्या: । ब्रह्मऽजाया । इति । च । इत् । अवोचत् । न । दूताय । प्रऽहेया । तस्थे । एषा । तथा । राष्ट्रम् । गुपितम् । क्षत्रियस्य ॥१७.३॥

Meaning
१. जिस समय एक आराधक इस वेदवाणी को यह (ब्रह्मजाया) = ब्रह्म का प्रकाश [प्रादुर्भाव] करनेवाली है, (इति चेत् अवोचत्) = इसप्रकार कहता है तब (अस्याः हस्तेन एव) = इस ब्रह्मजाया के हाथ से ही-आनय से ही (आधिः) = सब दुःख (ग्राह्य) = वश में करने योग्य होते हैं। ब्रह्मजाया का हाथ पकड़ते ही सब कष्ट दूर हो जाते है। २. (एषा) = यह बेदवाणी दूताया प्रहेया-दूत के लिए भेजने योग्य होती हुई (न तस्थे) = स्थित नहीं होती. अर्थात इसे स्वयं न पढ़कर किसी और से इसका पाठ कराते रहने से पुण्य प्राप्त नहीं होता। क्(षत्रियस्य राष्ट्रं तथा गुपितम्) = एक क्षत्रिय राष्ट्र भी तो इसीप्रकार रक्षित होता है। दूसरों को शासन सौंपकर, स्वयं भोग-विलास में पड़े रहनेवाला राजा कभी राष्ट्र को सुरक्षित नहीं कर पाता।
Essence
स्वाध्याय मनुष्य को स्वयं करना है। यह स्वाध्याय उसके सब कष्टों को दूर करेगा।
Subject
स्वाध्याय से कष्ट-निवारण

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