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Atharvaveda - Mantra 13

Atharvaveda 5/17/13

31 Sukta
18 Mantra
5/17/13
Devata- ब्रह्मजाया Rishi- मयोभूः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ब्रह्मजाया सूक्त
Mantra with Swara
न वि॑क॒र्णः पृ॒थुशि॑रा॒स्तस्मि॒न्वेश्म॑नि जायते। यस्मि॑न्रा॒ष्ट्रे नि॑रु॒ध्यते॑ ब्रह्मजा॒याचि॑त्त्या ॥

न । वि॒ऽक॒र्ण: । पृ॒थु॒ऽशि॑रा: । तस्मि॑न् । वेश्म॑नि । जा॒य॒ते॒ । यस्मि॑न् । रा॒ष्ट्रे । नि॒ऽरु॒ध्यते॑ । ब्र॒ह्म॒ऽजा॒या । अचि॑त्त्या ॥१७.१३॥

Mantra without Swara
न विकर्णः पृथुशिरास्तस्मिन्वेश्मनि जायते। यस्मिन्राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्त्या ॥

न । विऽकर्ण: । पृथुऽशिरा: । तस्मिन् । वेश्मनि । जायते । यस्मिन् । राष्ट्रे । निऽरुध्यते । ब्रह्मऽजाया । अचित्त्या ॥१७.१३॥

Meaning
१. (यस्मिन् राष्ट्र) = जिस राष्ट्र में (अचित्या) = नासमझी के कारण (ब्रह्मजाया) = प्रभु से प्रादुर्भूत की गई [ब्रह्मण: जायते] यह वेदवाणी (निरुध्यते) = रोकी जाती है, अर्थात् जहाँ वेदज्ञान का प्रचार नहीं होता, वहाँ (अस्य) = इस ब्रह्मजाया का निरोध करनेवाले पुरुष की (जाया) = पत्नी जो शतवाही-घर के सैकड़ों कार्यों को करनेवाली व (कल्याणी) = मङ्गल-साधिका होनी चाहिए थी, वह (न तल्पम् आश्ये) = अपने बिछौने पर नहीं सोती, अर्थात् वह सती न रहकर स्वैरिणी बन जाती है, तब शतवाहीत्व और कल्याणीत्व का तो प्रसङ्ग ही नहीं रहता। २. इसीप्रकार जिस घर में वेदाध्ययन की परिपाटी नहीं रहती (तस्मिन् वेश्मनि) = उस घर में (विकर्ण:) = विशिष्ट श्रोत्रशक्तिवाला-शास्त्रों का खुब ही श्रवण करनेवाला (पृथुशिरा:) = विशाल मस्तिष्कवाला सन्तान (न जायते) = उत्पन्न नहीं होता। माता-पिता जब अध्ययन ही नहीं करेंगे तब सन्तान ज्ञान की रुचिवाले कैसे होंगे?
Essence
जिन घरों में वेदाध्ययन की परिपाटी नहीं रहती, वहाँ स्त्रियों का आचरण ठीक नहीं रहता और सन्तान पठन की रुचिवाले नहीं होते, निर्बल-मस्तिष्क सन्तान उत्पन्न होते हैं।
Subject
वेदत्याग व पाप-प्रसार

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