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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 5/14/3

31 Sukta
13 Mantra
5/14/3
Devata- कृत्यापरिहरणम् Rishi- शुक्रः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कृत्यापरिहरण सूक्त
Mantra with Swara
रि॑श्यस्येव परीशा॒सं प॑रि॒कृत्य॒ परि॑ त्व॒चः। कृ॒त्यां कृ॑त्या॒कृते॑ देवा नि॒ष्कमि॑व॒ प्रति॑ मुञ्चत ॥

रिश्य॑स्यऽइव । प॒रि॒ऽशा॒सनम् । प॒रि॒ऽकृत्य॑ । परि॑ । त्व॒च: । कृ॒त्याम् । कृ॒त्या॒ऽकृते॑ । दे॒वा॒: । नि॒ष्कम्ऽइ॑व । प्रति॑ । मु॒ञ्च॒त॒ ॥१४.३॥

Mantra without Swara
रिश्यस्येव परीशासं परिकृत्य परि त्वचः। कृत्यां कृत्याकृते देवा निष्कमिव प्रति मुञ्चत ॥

रिश्यस्यऽइव । परिऽशासनम् । परिऽकृत्य । परि । त्वच: । कृत्याम् । कृत्याऽकृते । देवा: । निष्कम्ऽइव । प्रति । मुञ्चत ॥१४.३॥

Meaning
१. हे (देवा:) = विद्वानो! (त्वचः परि) = त्वचा को चारों ओर से (परिकत्य) = छिन्न करके (रिश्यस्य) = एक वन्य पशु के [मृगविशेष के] (परीशासं इव) = पूर्ण वशीकरण के समान (कृत्याम्) = एक दुष्ट पुरुष से किये गये छेदन-प्रयोग को (कृत्याकृते) = इस छेदन करनेवाले के लिए ही (निष्कम् इव) = स्वर्णहार के समान (प्रतिमुञ्चत) = धारण कराओ। २. एक दुष्ट पुरुष हमारा विनाश करने के लिए कुछ प्रयोग करता है। उसके प्रति हमारा व्यवहार ऐसा हो कि वह विनाश-क्रिया उस विनाशक के ही गले का स्वर्णहार बने। हम उस कृत्या से प्रभावित न हों। बुद्धिपूर्वक व्यवहार करते हुए इन छेदन भेदन के प्रयोगों से हम अपने को सुरक्षित रक्खें।
Essence
जैसे एक मृग को वश में किया जाता है, उसी प्रकार ध्वंसक पुरुष को वश में करके हम उससे की जानेवाली कृत्या को उसी के लिए लौटानेवाले बनें।
Subject
वन्य पशु के समान ध्वंसक का वशीकरण

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