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Atharvaveda - Mantra 13

Atharvaveda 5/14/13

31 Sukta
13 Mantra
5/14/13
Devata- कृत्यापरिहरणम् Rishi- शुक्रः Chhanda- स्वराडनुष्टुप् Suktam- कृत्यापरिहरण सूक्त
Mantra with Swara
अ॒ग्निरि॑वैतु प्रति॒कूल॑मनु॒कूल॑मिवोद॒कम्। सु॒खो रथ॑ इव वर्ततां कृ॒त्या कृ॑त्या॒कृतं॒ पुनः॑ ॥

अ॒ग्नि:ऽइ॑व । ए॒तु॒ । प्र॒ति॒ऽकूल॑म् । अ॒नु॒कूल॑म्ऽइव । उ॒द॒कम् । सु॒ख: । रथ॑:ऽइव । व॒र्त॒ता॒म् । कृ॒त्या । कृ॒त्या॒ऽकृत॑म् । पुन॑: ॥१४.१३॥

Mantra without Swara
अग्निरिवैतु प्रतिकूलमनुकूलमिवोदकम्। सुखो रथ इव वर्ततां कृत्या कृत्याकृतं पुनः ॥

अग्नि:ऽइव । एतु । प्रतिऽकूलम् । अनुकूलम्ऽइव । उदकम् । सुख: । रथ:ऽइव । वर्तताम् । कृत्या । कृत्याऽकृतम् । पुन: ॥१४.१३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यह (कृत्या) = छेदन-भेदन की क्रिया (प्रतिकूलम्) = हमारे विरोधी को (अग्निः इव एतु) = अग्नि के समान प्राप्त हो-यह उसे जलानेवाली हो, परन्तु यही (कृत्या अनुकूलम्) = हमारे अनुकूल को (उदकम् इव) = पानी की भाँति प्राप्त हो-उसे यह विनष्ट न कर सके। २. (सुख:) = उत्तम इन्द्रियाश्वोंवाला यह शरीर (रथः इव) =  जीवन-यात्रा की पूर्ति के लिए रथ के समान हो। (कृत्या) = विनाश की क्रिया (कृत्याकृतम्) = विनाशक को ही (पुनः) = फिर (वर्तताम्) = प्राप्त हो। यह उसी का विनाश करनेवाली बने।
Essence
कृत्या प्रतिकूल व्यक्ति को अग्नि की भाँति प्राप्त हो, अनुकूल व्यक्तियों के लिए यह जल के समान हो जाए। इन कृत्याओं से बचे रहकर हम अपने शरीर-रथ को उत्तम इन्द्रियाश्वोंवाला बनाएँ।
Subject
अग्नि: इव, उदकम् इव
Special
सब प्रकार की हिंसा की भावनाओं को दूर करनेवाला पुरुष विश्वामित्र है। यही अगले दो सूक्तों का ऋषि है।