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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 5/14/1

31 Sukta
13 Mantra
5/14/1
Devata- ओषधिः Rishi- शुक्रः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- कृत्यापरिहरण सूक्त
Mantra with Swara
सु॑प॒र्णस्त्वान्व॑विन्दत्सूक॒रस्त्वा॑खनन्न॒सा। दिप्सौ॑षधे॒ त्वं दिप्स॑न्त॒मव॑ कृत्या॒कृतं॑ जहि ॥

सु॒ऽप॒र्ण: । त्वा॒ । अनु॑ । अ॒वि॒न्द॒त् । सू॒क॒र: । त्वा॒ । अ॒ख॒न॒त् । न॒सा । दिप्स॑ । ओ॒ष॒धे॒ । त्वम् । दिप्स॑न्तम् । अव॑ । कृ॒त्या॒ऽकृत॑म् । ज॒हि॒ ॥१४.१॥

Mantra without Swara
सुपर्णस्त्वान्वविन्दत्सूकरस्त्वाखनन्नसा। दिप्सौषधे त्वं दिप्सन्तमव कृत्याकृतं जहि ॥

सुऽपर्ण: । त्वा । अनु । अविन्दत् । सूकर: । त्वा । अखनत् । नसा । दिप्स । ओषधे । त्वम् । दिप्सन्तम् । अव । कृत्याऽकृतम् । जहि ॥१४.१॥

Meaning
१. हे (ओषधे) = शरीरस्थ दोष का दहन करनेवाली ओषधे! (सुपर्ण:) = गरुड़ (त्वा) = तुझे (अनु अविन्दत्) = खोजकर पानेवाला होता है। (सूकर:) = सूअर (त्वा) = तुझे (नसा अखनत्) = अपनी नासिका से खोदनेवाला होता है। २. हे (ओषधे) = ओषधे! (त्वम्) = तू (दिप्सन्तम्) = हमें नष्ट करने की इच्छावाले को (दिप्स) = नष्ट करनेवाली हो। (कृत्याकृतं अवजहि) = हमारा छेदन करनेवाली व्याधि को सुदूर विनष्ट कर।
Essence
भूमि से खोदकर प्राप्त की जानेवाली यह ओषधि हमारे रोग का विनाश करती है। यह शक्तियों का छेदन करनेवाली व्याधि को दूर करती है।

 
Subject
बनस्पति

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