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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 5/12/9

31 Sukta
11 Mantra
5/12/9
Devata- जातवेदा अग्निः Rishi- अङ्गिराः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ऋतयज्ञ सूक्त
Mantra with Swara
य इ॒मे द्यावा॑पृथि॒वी जनि॑त्री रू॒पैरपिं॑श॒द्भुव॑नानि॒ विश्वा॑। तम॒द्य हो॑तरिषि॒तो यजी॑यान्दे॒वं त्वष्टा॑रमि॒ह य॑क्षि वि॒द्वान् ॥

य: । इ॒मे इति॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । जनि॑त्री॒ इति॑ । रू॒पै: । अपि॑शत् । भुव॑नानि । विश्वा॑ । तम् । अ॒द्य । हो॒त॒: । इ॒षि॒त: । यजी॑यान् । दे॒वम् । त्वष्टा॑रम् । इ॒ह । य॒क्षि॒ । वि॒द्वान् ॥१२.९॥

Mantra without Swara
य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद्भुवनानि विश्वा। तमद्य होतरिषितो यजीयान्देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान् ॥

य: । इमे इति । द्यावापृथिवी इति । जनित्री इति । रूपै: । अपिशत् । भुवनानि । विश्वा । तम् । अद्य । होत: । इषित: । यजीयान् । देवम् । त्वष्टारम् । इह । यक्षि । विद्वान् ॥१२.९॥

Meaning
१. (य:) = जो (त्वष्टा इमे) = इस (द्यावापृथिवी) = द्युलोक व पृथिवीलोक को और सब भूतों को (जनित्री) = जन्म देनेवाला है, इन्हें (रूपैः अपिंशत) = रूपों से अलंकृत करता है तथा (विश्वा भवनानि) = सब भुवनों को रूपों से सजाता है, अर्थात् जिस त्वष्टा के कारण उस-उस पिण्ड व लोक में अमुक-अमुक सौन्दर्य है, (तम्) = उस (देवम् त्वष्टारम्) = दिव्य गुणोंवाले-सब देवों को देवत्व प्राप्त करानेवाले त्वष्टादेव को, हे (होत:) = त्यागपूर्वक अदन करनेवाले ! (इषित:) = प्रभु से प्रेरणा को प्राप्त हुआ-हुआ (यजीयान्) = अतिशयेन यज्ञशील (विद्वान्) = ज्ञानी तू (इह) = इस मानव-जीवन में (यक्षि) = संगत कर-प्रभु से अपना सम्बन्ध बना। २. वे प्रभु जैसे सूर्य आदि देवों को रूपों से अलंकृत करते हैं, तुझे भी रूपों से अलंकृत करेंगे। तू 'इषित' बन-प्रभु-प्रेरणा को सुननेवाला बन। तू यजीयान् हो-अतिशयेन यज्ञशील हो। तू विद्वान् व ज्ञानी बन। इसप्रकार का बनने का यत्न करने पर ही तू प्रभु-सम्पर्क को प्राप्त करेगा। उस समय तेरा जीवन भी धुलोक व पृथिवीलोक की भाँति रूपों से अलंकृत होगा।
Essence
त्वष्टा ब्रह्माण्ड का निर्माता होकर उसे सौन्दर्य प्रदान करता है। हम उसके सम्पर्क में आएंगे तो वह हमें भी सौन्दर्य प्रदान करेगा।
Subject
त्वष्टा का सम्पर्क व सौन्दर्य-प्राप्ति

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