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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 5/12/7

31 Sukta
11 Mantra
5/12/7
Devata- जातवेदा अग्निः Rishi- अङ्गिराः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ऋतयज्ञ सूक्त
Mantra with Swara
दैव्या॒ होता॑रा प्रथ॒मा सु॒वाचा॒ मिमा॑ना य॒ज्ञं मनु॑षो॒ यज॑ध्यै। प्र॑चो॒दय॑न्ता वि॒दथे॑षु का॒रू प्रा॒चीनं॒ ज्योतिः॑ प्र॒दिशा॑ दि॒शन्ता॑ ॥

दैव्या॑ । होता॑रा । प्र॒थ॒मा । सु॒ऽवाचा॑ । मिमा॑ना । य॒ज्ञम् । मनु॑ष: । यज॑ध्यै । प्र॒ऽचो॒दय॑न्ता । वि॒दथे॑षु । का॒रू इति॑ । प्रा॒चीन॑म् । ज्योति॑: । प्र॒ऽदिशा॑ । दि॒शन्ता॑ ॥१२.७॥

Mantra without Swara
दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै। प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता ॥

दैव्या । होतारा । प्रथमा । सुऽवाचा । मिमाना । यज्ञम् । मनुष: । यजध्यै । प्रऽचोदयन्ता । विदथेषु । कारू इति । प्राचीनम् । ज्योति: । प्रऽदिशा । दिशन्ता ॥१२.७॥

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Meaning
१. हमारे प्राणापान (दैव्या होतारा) = उस देव को प्राप्त करानेवाले होते हैं। (प्रथमा) = ये इस शरीर में रहनेवाले देवों में प्रथम हैं। सवाचा उत्तम वाणीवाले हैं। प्राणापान की क्षीणता से वाणी भी क्षीण होने लगती है। (मनुषः) = इस मननशील मनुष्य के (यजध्यै) = प्रभु से मेल करने के लिए यज्ञ (मिमाना) = ये प्राणापान यज्ञों का निर्माण करते हैं। २. साधक के ये प्राणापान (विदथेषु) = ज्ञानयज्ञों में (प्रचोदयन्ता) = प्रकृष्ट प्रेरणा प्राप्त कराते हैं, (कारू) = ये प्राणापान प्रत्येक कार्य को कलापूर्ण ढंग से करानेवाले होते हैं। प्राणसाधक के कार्यों में अनाड़ीपन नहीं टपकता। ये प्राणापान (प्रदिशा) = वेदोपदिष्ट मार्ग से (प्राचीन ज्योति:) = [प्रअञ्च्] उन्नति की साधनभूत ज्योति को अथवा सनातन ज्ञान को (दिशन्ता) = उपदिष्ट करते हैं।
Essence
प्राणापान की साधना हमें प्रभु से मिलाती है, ज्ञान को बढ़ाती है, हमारे कार्यों में सौन्दर्य लाती है और सनातन ज्योति का आभास कराती है।
Subject
दैव्या होतारा [प्राणापान]