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Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 5/12/11

31 Sukta
11 Mantra
5/12/11
Devata- जातवेदा अग्निः Rishi- अङ्गिराः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ऋतयज्ञ सूक्त
Mantra with Swara
स॒द्यो जा॒तो व्य॑मिमीत य॒ज्ञम॒ग्निर्दे॒वाना॑मभवत्पुरो॒गाः। अ॒स्य होतुः॑ प्र॒शिष्यृ॒तस्य॑ वा॒चि स्वाहा॑कृतं ह॒विर॑दन्तु दे॒वाः ॥

स॒द्य: । जा॒त: । वि । अ॒मि॒मी॒त॒ । य॒ज्ञम् । अ॒ग्नि: । दे॒वाना॑म् । अ॒भ॒व॒त् । पु॒र॒:ऽगा: । अ॒स्य । होतु॑: । प्र॒ऽशिषि॑ । ऋ॒तस्य॑ । वा॒चि । स्वाहा॑ऽकृतम् । ह॒वि: । अ॒द॒न्तु॒ । दे॒वा: ॥१२.११॥

Mantra without Swara
सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत्पुरोगाः। अस्य होतुः प्रशिष्यृतस्य वाचि स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः ॥

सद्य: । जात: । वि । अमिमीत । यज्ञम् । अग्नि: । देवानाम् । अभवत् । पुर:ऽगा: । अस्य । होतु: । प्रऽशिषि । ऋतस्य । वाचि । स्वाहाऽकृतम् । हवि: । अदन्तु । देवा: ॥१२.११॥

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Meaning
१. (जात:) = आचार्य-गर्भ से उत्पन्न हुआ-हुआ-आर्चायकुल से लौटा हुआ (सद्यः) =  शीघ्र ही (यज्ञं व्यमिमीत) = यज्ञों को करनेवाला बनता है। एक सद्गृहस्थ को पाँचों महायज्ञ करने ही चाहिएँ, तभी यह (अग्निः) = आगे बढ़नेवाला होता है, (देवानां पुरोगा: अभवत्) = आगे बढ़ते-बढ़ते यह देवों का भी अग्रगामी बनता है-देवों में भी इसका स्थान प्रथम होता है। २. (अस्य होतुः) = इस सृष्टियज्ञ के होता परमात्मा के (प्रशिषि) = प्रकृष्ट निर्देश में (ऋतस्य) = सत्य वेदवाणी के, अर्थात् प्रभु के वेद में प्रतिपादित मार्ग के अनुसार (स्वाहाकृतम्) = अग्नि में 'स्वाहा' शब्दोच्चारणपूर्वक डाली हुई (हवि:) = हवि को-हव्य पदार्थ को (देवा:) = माता, पिता आचार्य व अतिथि आदि देव (अदन्तु) = खाएँ, अर्थात् मनुष्य वेदोपदिष्ट मार्ग से अग्निहोत्र करके माता, पिता, आचार्य व अतिथि आदि को श्रद्धापूर्वक खिलाये। इन्हें खिलाकर यज्ञशेष का खाना ही हमारी अमरता का साधन है।
Essence
आचार्यकुल से समावृत्त होकर हम गृहस्थ बनें और यज्ञशील हों। वेद के आदेश के अनुसार अग्निहोत्र करें। माता-पिता आदि को खिलाकर उनके पश्चात् भोजन करें, अतिथियों से पूर्व न खाने लग जाएँ। यज्ञशेष का सेवन करनेवाले ही देव व अमर बनते हैं।
Subject
यज्ञशील गृहस्थ
Special
अगले सूक्त में बिष-निवारण का प्रकरण है। जीवन के लिए विष की बाधा एक प्रबल विघ्न है। इसका दूर करना आवश्यक ही है, सों को समाप्त करनेवाला 'गरुत्मान्-गरुड़ अगले सूक्त का ऋषि है। गरुत्मान् सपों को समाप्त करता है। विष-चिकित्सक को भी 'गरुत्मान्' कह दिया गया है -