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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 5/10/6

31 Sukta
8 Mantra
5/10/6
Devata- वास्तोष्पतिः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- यवमध्यात्रिपदागायत्री Suktam- आत्मा रक्षा सूक्त
Mantra with Swara
अ॑श्मव॒र्म मे॑ऽसि॒ यो मो॒र्ध्वाया॑ दि॒शोऽघा॒युर॑भि॒दासा॑त्। ए॒तत्स ऋ॑च्छात् ॥

अ॒श्म॒ऽव॒र्म । मे॒ । अ॒सि॒ । य: । मा॒ । ऊ॒र्ध्वाया॑: । दि॒श: । अ॒घ॒ऽयु: । अ॒भि॒ऽदासा॑त् । ए॒तत् । स:। ऋ॒च्छा॒त् ॥१०.६॥

Mantra without Swara
अश्मवर्म मेऽसि यो मोर्ध्वाया दिशोऽघायुरभिदासात्। एतत्स ऋच्छात् ॥

अश्मऽवर्म । मे । असि । य: । मा । ऊर्ध्वाया: । दिश: । अघऽयु: । अभिऽदासात् । एतत् । स:। ऋच्छात् ॥१०.६॥

Meaning
१. साधक कहता है कि हे ब्रह्म [प्रभो]! आप (मे) = मेरे (अश्मवर्म असि) = पत्थर के [सुदढ़] कवच हैं-(बह्मवर्म ममान्तरम्)। आपसे (रक्षित मा) = मुझे (यः) = जो (अघायु:) = अघ-[अशुभ, पाप] की कामनावाला (प्राच्या: दिश:) = पूर्व दिशा की ओर से, (दक्षिणायाः दिश:) = दक्षिण दिशा की ओर से, (प्रतीच्याः दिश:) = पश्चिम दिशा की ओर से (उदीच्या: दिश:) = उत्तर दिशा की और से, (ध्रुवाया: दिश:) = धूवा दिशा की ओर से, (ऊर्ध्वया: दिश:) = ऊवा दिक की ओर से तथा दिशाम (अन्तर्देशेभ्य:) = दिशाओं के अन्तर्देशों से (अभिदासात्) = आक्रमण करके उपक्षीण करना चाहता है, (एतत्) = इस अघ को-इस उपक्षय को (सः ऋच्छात्) = वह स्वयं प्राप्त हो। २. हमारे ब्रह्म-कवच से टकराकर यह अघ उस अघायु को ही पुन: प्राप्त हो। यह अघायु हमें हानि न पहुँचा सके। उसके क्रोध को हम अक्रोध से जीतनेवाले बनें, उसके आकाशों को कुशल शब्दों से पराजित करनेवाले हों।
Essence
हम ब्रह्म को अपना कवच बनाकर चलें। उस समय जो कोई भी अघायु पुरुष हमारे प्रति पाप करेगा, वह पाप लौटकर उसे ही व्यथित करेगा।


 
Subject
अघायु से किया गया अघ उसे ही प्राप्त हो

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