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Atharvaveda - Mantra 8

Atharvaveda 5/1/8

31 Sukta
9 Mantra
5/1/8
Devata- वरुणः Rishi- बृहद्दिवोऽथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अमृता सूक्त
Mantra with Swara
उ॒त पु॒त्रः पि॒तरं॑ क्ष॒त्रमी॑डे ज्ये॒ष्ठं म॒र्याद॑मह्वयन्त्स्व॒स्तये॑। दर्श॒न्नु ता व॑रुण॒ यास्ते॑ वि॒ष्ठा आ॒वर्व्र॑ततः कृणवो॒ वपूं॑षि ॥

उ॒त । पु॒त्र: । पि॒तर॑म् । क्ष॒त्रम् । ई॒डे॒ । ज्ये॒ष्ठम् । म॒र्याद॑म् । अ॒ह्व॒य॒न् । स्व॒स्तये॑ । दर्श॑न् । नु । ता: । व॒रु॒ण॒ । या:। ते॒ । वि॒ऽस्था: । आ॒ऽवर्व्र॑तत: । कृ॒ण॒व॒: । वपूं॑षि ॥१.८॥

Mantra without Swara
उत पुत्रः पितरं क्षत्रमीडे ज्येष्ठं मर्यादमह्वयन्त्स्वस्तये। दर्शन्नु ता वरुण यास्ते विष्ठा आवर्व्रततः कृणवो वपूंषि ॥

उत । पुत्र: । पितरम् । क्षत्रम् । ईडे । ज्येष्ठम् । मर्यादम् । अह्वयन् । स्वस्तये । दर्शन् । नु । ता: । वरुण । या:। ते । विऽस्था: । आऽवर्व्रतत: । कृणव: । वपूंषि ॥१.८॥

Meaning
१. (उत) = और (पुत्र:) = प्रभु का योग्य पुत्र बनता हुआ मैं (पितरम) = अपने पिता प्रभु से (क्षत्रम् ईडे) = बल की याचना करता है। ज्ञानी लोग उस (ज्येष्ठम्) = सर्वश्रेष्ठ (मर्यादम्) = सब मर्यादाओं का स्थापन करनेवाले प्रभु को (स्वस्तये) = कल्याण के लिए (अहयन्) = पुकारते हैं। २. हे (वरुण) = वरणीय प्रभो! (या:) = जो (ते) = आपकी (विष्ठा:) = व्यवस्थाएँ हैं, (नु) = निश्चय से (ता:) = उन्हें ये ज्ञानी पुरुष दर्शन देखते हैं। 'ब्रह्माण्ड में प्रत्येक पिण्ड को वे प्रभु किस प्रकार मर्यादा में चला रहे हैं'-इस बात को देखकर आश्चर्य ही होता है। इसीप्रकार हे प्रभो! आप ही (आवर्वतत:) = [आवृत् यङ्लुगन्तशत] कर्मफल के अनुसार विभिन्न योनियों में विचरनेवाले जीव के वषि-शरीरों को कृणव: करते हैं। जीवों को कर्मानुसार विविध शरीर आप ही प्राप्त कराते हैं।
Essence
हम प्रभु से बल की याचना करें। ब्रह्माण्ड में उस प्रभु की व्यवस्था को देखें और प्रभु को ही कर्मानुसार विविध शरीरों को प्राप्त करानेवाला जानें।
Subject
पुत्र की पिता से बल की याचना

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