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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 5/1/7

31 Sukta
9 Mantra
5/1/7
Devata- वरुणः Rishi- बृहद्दिवोऽथर्वा Chhanda- विराड्जगती Suktam- अमृता सूक्त
Mantra with Swara
उ॒तामृता॑सु॒र्व्रत॑ एमि कृ॒ण्वन्नसु॑रा॒त्मा त॒न्वस्तत्सु॒मद्गुः॑। उ॒त वा॑ श॒क्रो रत्नं॒ दधा॑त्यू॒र्जया॑ वा॒ यत्सच॑ते हवि॒र्दाः ॥

उ॒त । अ॒मृत॑ऽअसु: । व्रत॑: । ए॒मि॒ । कृ॒ण्वन् । असु॑: । आ॒त्मा । त॒न्व᳡: । तत् । सु॒मत्ऽगु॑: ।उ॒त । वा॒ । श॒क्र: । रत्न॑म् । दधा॑ति । ऊ॒र्जया॑ । वा॒ । यत् । सच॑ते । ह॒वि॒:ऽदा: ॥१.७॥

Mantra without Swara
उतामृतासुर्व्रत एमि कृण्वन्नसुरात्मा तन्वस्तत्सुमद्गुः। उत वा शक्रो रत्नं दधात्यूर्जया वा यत्सचते हविर्दाः ॥

उत । अमृतऽअसु: । व्रत: । एमि । कृण्वन् । असु: । आत्मा । तन्व: । तत् । सुमत्ऽगु: ।उत । वा । शक्र: । रत्नम् । दधाति । ऊर्जया । वा । यत् । सचते । हवि:ऽदा: ॥१.७॥

Meaning
१. (उत) = और (अमृतासुः) = अविनाशी प्रभु को अपना प्राण समझनेवाला (व्रतः) = व्रतमय जीवनवाला मैं (कृण्वत्) = कर्म करता हुआ ही (एमि) = जीवन-यात्रा में चलता हूँ। असुरात्मा [असु+र] प्राणशक्ति का सञ्चार करनेवाले प्रभु को अपना आत्मा समझनेवाला यह साधक (तत) = तब (तन्व:) = इस शरीर को (सुमदगः) = [सुमत्-प्रशस्त] प्रशस्त इन्द्रियोंवाला बनाता है। प्रभु-स्मरण से इन्द्रियाँ विषय-वासनाओं से मलिन नहीं होती। २. (उत वा) = और निश्चय से (शुक्र:) = वह सर्वशक्तिमान् प्रभु (यत्) = अब-इस साधक के जीवन में (रत्नम्) = रमणीय तत्वों को दधाति धारण करते हैं तो (हविर्दा) = यह हवि देनेवाला-यज्ञशील व्यक्ति (वा) = निश्चय से (ऊर्जया सचते) = बल और प्राणशक्ति से युक्त होता है।
Essence
हम प्रभु को ही अपना प्राण समझें, प्रभु को ही अपनी आत्मा जानें। इससे हम प्रशस्त इन्द्रियोंवाले बनेंगे। प्रभु हममें रमणीय रत्नों को धारण करेंगे। हम यज्ञशील बनकर बल व प्राणशक्ति से सम्पन्न होंगे।
Subject
अमृतासु-असुरात्मा

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