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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 4/7/5

40 Sukta
7 Mantra
4/7/5
Devata- वनस्पतिः Rishi- गरुत्मान् Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- विषनाशन सूक्त
Mantra with Swara
परि॒ ग्राम॑मि॒वाचि॑तं॒ वच॑सा स्थापयामसि। तिष्ठा॑ वृ॒क्ष इ॑व॒ स्थाम्न्यभ्रि॑खाते॒ न रू॑रुपः ॥

परि॑ । ग्राम॑म्ऽइव । आऽचि॑तम् । वच॑सा । स्था॒प॒या॒म॒सि॒ । तिष्ठ॑ । वृ॒क्ष:ऽइ॑व । स्थाम्नि॑ । अभ्रि॑ऽखाते । न । रू॒रु॒प॒:। ७.५॥

Mantra without Swara
परि ग्राममिवाचितं वचसा स्थापयामसि। तिष्ठा वृक्ष इव स्थाम्न्यभ्रिखाते न रूरुपः ॥

परि । ग्रामम्ऽइव । आऽचितम् । वचसा । स्थापयामसि । तिष्ठ । वृक्ष:ऽइव । स्थाम्नि । अभ्रिऽखाते । न । रूरुप:। ७.५॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ग्रामम् इव) = ग्राम के समान-जनसमूह के समान (आचितम्) = उपचित हुए-हुए इस विष को (वचसा) = बच ओषधि के प्रयोग से (परिस्थापयामसि) = अन्यत्र स्थापित करते हैं, अर्थात् दूर करते हैं। २. हे (अभ्रिखाते)  = कुदाल से खोदी गई ओषधे! तू (वृक्षः इव)-वृक्ष की भांति (स्थाम्नि)-स्थिरता में तिष्ठ-स्थित हो, अपने स्थान पर वृक्ष की भाँति निश्चल होकर ठहर । तू शरीर में व्याप्त मत हो। (रुरूमः) = तु शरीर को मूढ़ मत बना। वच के प्रयोग से गतमन्त्र की "मदावती' का प्रभाव सीमित [localised] हो जाता है।
Subject
स्थाम्नि तिष्ठ
Special
विष के बढ़ते प्रभाव को हम वच के प्रयोग से सीमित कर देते हैं।