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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 4/7/1

40 Sukta
7 Mantra
4/7/1
Devata- वनस्पतिः Rishi- गरुत्मान् Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- विषनाशन सूक्त
Mantra with Swara
वारि॒दम्वा॑रयातै वर॒णाव॑त्या॒मधि॑। तत्रा॒मृत॒स्यासि॑क्तं॒ तेना॑ ते वारये वि॒षम् ॥

वा: । इ॒दम् । वा॒र॒या॒तै॒ । व॒र॒णऽव॑त्याम् । अधि॑ । तत्र॑ । अ॒मृत॑स्य । आऽसि॑क्तम् । तेन॑ । ते॒ । वा॒र॒ये॒ । वि॒षम् ॥७.१॥

Mantra without Swara
वारिदम्वारयातै वरणावत्यामधि। तत्रामृतस्यासिक्तं तेना ते वारये विषम् ॥

वा: । इदम् । वारयातै । वरणऽवत्याम् । अधि । तत्र । अमृतस्य । आऽसिक्तम् । तेन । ते । वारये । विषम् ॥७.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (इदम्) = यह (वा:) = जल (वारयातै) = विष का निवारण करता है, जो (वरणावत्याम् अधि) = उस नदी में है, जो वरण-वृक्षोंवाली है। जिस नदी के किनारे वरण-वृक्ष हों, उस नदी का जल विषनिवारक गुणों से युक्त होता है। २. (तत्र) = वहाँ उस वरण-वृक्षवाली नदी में (अमृतस्य आसक्तिम्) = अमृत का आसेचन होता है। वरण वृक्ष के पत्तों व फूलों आदि में जो रस है, वह नदी के जल को विष-निवारक औषथ-सा बना देता है। (तेन) = उससे (ते विषम्) = तेरे विष को वारये दूर करता है।
Essence
घर व ग्रामों में जलों के किनारे वरण-वृक्षों का रोपण करना चाहिए, इनसे उन जलों में विष-निवारणशक्ति उत्पन्न हो जाएगी। ये जल हमें नीरोग बनाएँगे।
Subject
वरणावत्याम् अधि