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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 4/6/3

40 Sukta
8 Mantra
4/6/3
Devata- सुपर्णः Rishi- गरुत्मान् Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- विषघ्न सूक्त
Mantra with Swara
सु॑प॒र्णस्त्वा॑ ग॒रुत्मा॒न्विष॑ प्रथ॒ममा॑वयत्। नामी॑मदो॒ नारू॑रुप उ॒तास्मा॑ अभवः पि॒तुः ॥

सु॒ऽप॒र्ण: । त्वा॒ । ग॒रुत्मा॑न् । विष॑ । प्र॒थ॒मम् । आ॒व॒य॒त् । न । अ॒मी॒म॒द॒: । न । अ॒रू॒रु॒प॒: । उ॒त । अ॒स्मै॒ । अ॒भ॒व॒: । पि॒तु: ॥६.३॥

Mantra without Swara
सुपर्णस्त्वा गरुत्मान्विष प्रथममावयत्। नामीमदो नारूरुप उतास्मा अभवः पितुः ॥

सुऽपर्ण: । त्वा । गरुत्मान् । विष । प्रथमम् । आवयत् । न । अमीमद: । न । अरूरुप: । उत । अस्मै । अभव: । पितु: ॥६.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१.हे (विष) = विष (गरुत्मान्) = कर्म व ज्ञानरूप उत्तम पंखोंवाले (सुपर्ण:) = सम्यक् पालक व पूरणात्मक कर्मों में प्रवृत्त पुरुष ने (प्रथमम्) = सर्वप्रथम (त्वा आवयत्) = तेरा भक्षण किया है, (न अमीमदः) = न तो तुने उसे मदयुक्त-ज्ञानविकल किया और न ही मूढ बनाया [रुप विमोहने]। २. ज्ञानविकल व मूढ़ बनना तो दूर रहा (उत) = प्रत्युत तू (अस्मै) = इस गरुत्मान् सुपर्ण के लिए (पितुः अभव:) = रक्षक अन्नवाला बन गया। गरुड़ पक्षी साँप को खा जाता है, परन्तु उसपर साँप के विष का घातक प्रभाव नहीं होता।
Essence
हम ज्ञान व कर्मरूप उत्तम पक्षोंवाले बनें। पालन व पूरणात्मक कर्मों में लगे हुए हम लोगों की विषैली बातों से ज्ञानविकल व मूढ़ न बनेंगे, अपितु उनके निन्दात्मक प्रलापों में अपनी कमियों का निरीक्षण करते हुए अपने को निर्दोष बनाने के लिए यत्नशील होंगे।
Subject
'गरुत्मान् सुपर्ण'