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Atharvaveda - Mantra 12

Atharvaveda 4/37/12

40 Sukta
12 Mantra
4/37/12
Devata- अजशृङ्ग्योषधिः Rishi- बादरायणिः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Suktam- कृमिनाशक सूक्त
Mantra with Swara
जा॒या इद्वो॑ अप्स॒रसो॒ गन्ध॑र्वाः॒ पत॑यो यू॒यम्। अप॑ धावतामर्त्या॒ मर्त्या॒न्मा स॑चध्वम् ॥

जा॒या: । इत् । व॒: । अ॒प्स॒रस॑: । गन्ध॑र्वा: । पत॑य: । यू॒यम् ।अप॑ । धा॒व॒त॒ । अ॒म॒र्त्या॒: । मर्त्या॑न् । मा । स॒च॒ध्व॒म् ॥३७.१२॥

Mantra without Swara
जाया इद्वो अप्सरसो गन्धर्वाः पतयो यूयम्। अप धावतामर्त्या मर्त्यान्मा सचध्वम् ॥

जाया: । इत् । व: । अप्सरस: । गन्धर्वा: । पतय: । यूयम् ।अप । धावत । अमर्त्या: । मर्त्यान् । मा । सचध्वम् ॥३७.१२॥

Meaning
१. हे (गन्धर्वाः) = गायन-सा करनेवाले कृमियो! (अप्सरस:) = जलप्राय स्थानों में विचरनेवाली ये अप्सराएँ-कृमिविशेष (इत) = ही (वः जाया:) = तुम्हारी पत्नियाँ हैं, (यूयम्) = तुम इनके पतयः-पति हो। २.हे (अमा:) = जिनका मारना बड़ा कठिन है, ऐसे कृमियो! (अपधावत) = तुम यहाँ से दूर भाग जाओ, हम (मान्) = मनुष्यों को (मा) = मत (सचध्वम्) = प्रास होओ, हमपर तुम्हारा आक्रमण न हो।
Essence
नर कृमि "गन्धर्व' हैं तो मादा 'अप्सरस्'। इनका मारना आसान नहीं। प्रभु के अनुग्रह से ये कृमि हमसे दूर रहें। हम स्वच्छता आदि की ऐसी व्यवस्था रक्खें कि इन कृमियों का यहाँ उद्भव ही न हो।

अगले सूक्त का ऋषि भी 'वादरायणि' ही है -
Subject
गन्धर्व अप्सराः

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