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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 4/35/6

40 Sukta
7 Mantra
4/35/6
Devata- अतिमृत्युः Rishi- प्रजापतिः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- मृत्युसंतरण सूक्त
Mantra with Swara
यस्मा॑त्प॒क्वाद॒मृतं॑ संब॒भूव॒ यो गा॑य॒त्र्या अधि॑पतिर्ब॒भूव॑। यस्मि॒न्वेदा॒ निहि॑ता वि॒श्वरू॑पा॒स्तेनौ॑द॒नेनाति॑ तराणि मृ॒त्युम् ॥

यस्मा॑त् । प॒क्वात् । अ॒मृत॑म् । स॒म्ऽब॒भूव॑ । य: । गा॒य॒त्र्या: । अधि॑ऽपति: । ब॒भूव॑ । यस्मि॑न् । वेदा॑: । निऽहि॑ता: । वि॒श्वऽरू॑पा: । तेन॑ । ओ॒द॒नेन॑ । अति॑ । त॒रा॒णि॒ । मृ॒त्युम् ॥३५.६॥

Mantra without Swara
यस्मात्पक्वादमृतं संबभूव यो गायत्र्या अधिपतिर्बभूव। यस्मिन्वेदा निहिता विश्वरूपास्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम् ॥

यस्मात् । पक्वात् । अमृतम् । सम्ऽबभूव । य: । गायत्र्या: । अधिऽपति: । बभूव । यस्मिन् । वेदा: । निऽहिता: । विश्वऽरूपा: । तेन । ओदनेन । अति । तराणि । मृत्युम् ॥३५.६॥

Meaning
१. (यस्मात् पक्वात्) = जिस परिपक्व हुए-हुए भोजन से (अमृतं सम्बभूव) = अमृत की उत्पत्ति होती है। ज्ञान का परिपाक होने पर निष्पापता होती है। यह निष्पापता 'नीरोगता व अमृतत्व' का साधन बनती है। (य:) = जो ज्ञान (गायत्र्या:) = गायत्री का (अधिपतिः बभूव) = अधिपति है [प्राणो गायत्रम्-तां० ७.१.९] यह ज्ञान प्राणशक्ति का स्वामी है। वासना-दहन द्वारा यह प्राणशक्ति का रक्षण करता है। अथवा [गायत्री गायते: स्तुतिकर्मणः-निरु०१.८] यह ज्ञान स्तुति का अधिपति है-ज्ञानी स्तोता ही सर्वोत्कृष्ट स्तोता है। २. (यस्मिन्) = जिस ज्ञान में (विश्वरूपा:) = सब सत्यविद्याओं का निरूपण करनेवाले (वेदा:निहिता:) = वेद निहित हैं, अर्थात् जो ज्ञान इन वेदों से निर्दिष्ट हुआ है, (तेन ओदनेन) = उस ज्ञानरूप भोजन से (मृत्युम् अतितराणि) = मैं मृत्यु को पार कर जाऊँ।
Essence
ज्ञान अमृतत्व का साधन है। यह प्राणशक्ति का अधिपति है। वेदों द्वारा प्रभु ने यह ज्ञान दिया है। इस ज्ञान से हम मृत्यु को तैर जाएँ।
Subject
गायत्री का अधिपति

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