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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 4/34/3

40 Sukta
8 Mantra
4/34/3
Devata- ब्रह्मौदनम् Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ब्रह्मौदन सूक्त
Mantra with Swara
वि॑ष्टा॒रिण॑मोद॒नं ये पच॑न्ति॒ नैना॒नव॑र्तिः सचते क॒दा च॒न। आस्ते॑ य॒म उप॑ याति दे॒वान्त्सं ग॑न्ध॒र्वैर्म॑दते सो॒म्येभिः॑ ॥

वि॒ष्टा॒रिण॑म् । ओ॒द॒नम् । ये । पच॑न्ति । न । ए॒ना॒न् । अव॑र्ति: । स॒च॒ते॒ । क॒दा । च॒न । आस्ते॑ । य॒मे । उप॑ । या॒ति॒ । दे॒वान् । सम् । ग॒न्ध॒र्वै: । म॒द॒ते॒ । सो॒म्येभि॑: ॥३४.३॥

Mantra without Swara
विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनानवर्तिः सचते कदा चन। आस्ते यम उप याति देवान्त्सं गन्धर्वैर्मदते सोम्येभिः ॥

विष्टारिणम् । ओदनम् । ये । पचन्ति । न । एनान् । अवर्ति: । सचते । कदा । चन । आस्ते । यमे । उप । याति । देवान् । सम् । गन्धर्वै: । मदते । सोम्येभि: ॥३४.३॥

Meaning
१. (ये) = जो (विष्टारिणम्) = शक्तियों का विस्तार करनेवाले (ओदनम्) = ज्ञान भोजन को (पचन्ति) = पकाते हैं, अर्थात् जो ज्ञान प्रधान जीवनवाले बनकर, भोगासक्ति से ऊपर उठ कर अपनी शक्तियों का विस्तार करते हैं, (एनान्) = ब्रह्मौदन का सेवन करनेवाले इन व्यक्तियों को (अवर्तिः) = [वर्ति जीविका] जीविका के लिए आवश्यक धन का अभाव (कदाचन) = कभी भी (न सचते) = नहीं प्राप्त होता ज्ञानी दारिद्र्य पीड़ित नहीं होता। २. यह ज्ञानी (यमे) = उस सर्वनियन्ता प्रभु में आस्ते आसीन होता है, (देवान् उपयाति) = दिव्य गुणों को प्राप्त होता है। ब्रह्म-उपासना दिव्य गुण प्राप्ति का साधन बनती है। यह (सोम्येभिः) = सोम का रक्षण करनेवाले - विनीत (गन्धर्वै:) = ज्ञान-वाणियों के धारक पुरुषों के साथ (संमदते) = उत्कृष्ट हर्षयुक्त होता है।
Essence
 ज्ञानप्रधान जीवनवाला व्यक्ति १. दरिद्र नहीं होता, २. प्रभु का उपासक होता है, ३. दैवीसम्पत्ति को प्राप्त होता है, ४. विनीत ज्ञानियों के सम्पर्क में हर्ष का अनुभव करता है।
Subject
विष्टारि ओदन

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