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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 4/33/6

40 Sukta
8 Mantra
4/33/6
Devata- अग्निः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- गायत्री Suktam- पापनाशन सूक्त
Mantra with Swara
त्वं हि वि॑श्वतोमुख वि॒श्वतः॑ परि॒भूर॑सि। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥

त्वम् । हि । वि॒श्व॒त॒:ऽमु॒ख॒ । वि॒श्वत॑: । प॒रि॒ऽभू: । असि॑ । अप॑ । न॒: । शोशु॑चत् । अ॒घम् ॥३३.६॥

Mantra without Swara
त्वं हि विश्वतोमुख विश्वतः परिभूरसि। अप नः शोशुचदघम् ॥

त्वम् । हि । विश्वत:ऽमुख । विश्वत: । परिऽभू: । असि । अप । न: । शोशुचत् । अघम् ॥३३.६॥

Meaning
१. हे (विश्वतोमुख) = सब ओर मुखोंवाले परामात्मन्! (त्वम्) = आप (हि) = निश्चय से (विश्वत:) = सब और से (परिभू:) = हमारे रक्षक (असि) = हैं [परिभू-परिग्रहीता]। चारों ओर से आक्रमण करनेवाले इन शत्रुओं को विश्वतोमुख आप ही नष्ट कर सकते हो। २.हे प्रभो। आपके रक्षण में (अघम्) = यह पाप (न:) = हमसे (अप) = दूर होकर (शोशुचत्) = शोक-सन्तप्त होकर नष्ट हो जाए। किसी भी ओर से पाप का आक्रमण हो, ये विश्वतोमुख प्रभु उसका नाश करते ही हैं। अन्दर-ही-अन्दर पैदा हो जानेवाले [मनसिज] कामादि शत्रु भी हृदयस्थ प्रभु के तेज से दग्ध हो जाते हैं।
Essence
विश्वतोमुख प्रभु का उपासन हमें सब ओर से रक्षित करता है, हमपर पापों का आक्रमण नहीं होने देता।
Subject
विश्वतोमुख प्रभु का उपासन

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