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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 4/33/3

40 Sukta
8 Mantra
4/33/3
Devata- अग्निः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- गायत्री Suktam- पापनाशन सूक्त
Mantra with Swara
प्र यद्भन्दि॑ष्ठ एषां॒ प्रास्माका॑सश्च सू॒रयः॑। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥

प्र । यत् । भन्दि॑ष्ठ: । ए॒षा॒म् । प्र । अ॒स्माका॑स: । च॒ । सू॒रय॑: । अप॑ । न॒: । शोशु॑चत् । अ॒घम् ॥३३.३॥

Mantra without Swara
प्र यद्भन्दिष्ठ एषां प्रास्माकासश्च सूरयः। अप नः शोशुचदघम् ॥

प्र । यत् । भन्दिष्ठ: । एषाम् । प्र । अस्माकास: । च । सूरय: । अप । न: । शोशुचत् । अघम् ॥३३.३॥

Meaning
१. (यत्) = क्योंकि मैं (एषाम) = इन मनुष्यों का (प्रभन्दिष्ठः) = [भदि कल्याणे सुखे च] अधिक से-अधिक कल्याण व सुख करनेवाला हूँ च और (अस्माकास:) = हमारे साथ मेलवाले लोग (प्रसूरयः) = प्रकृष्ट ज्ञानी हैं, अर्थात् हम ज्ञानियों के सम्पर्क में ही उठते-बैठते हैं, अत: (न:) = हमारा (अघम्) = पाप (अप) = हमसे पृथक होकर (शोशुचत्) = शोक-सन्तप्त होकर नष्ट हो जाए। २. पाप को दूर करने के लिए आवश्यक है कि [क] हम लोकहित के कर्मों में लगे रहें, आराम की वृत्ति आई तो पाप भी आये, [ख] हम सदा ज्ञानियों के सम्पर्क में रहें, उन्हीं के साथ हमारा उठना बैठना हो। सत्सङ्ग पाप से बचाता है, कुसंग पाप में फँसाता है।
Essence
पाप से बचने के लिए हम लोकहित के कामों में लगे रहें और सदा सत्संग में रहें।
Subject
लोकहितप्रवृत्ति व सजन-संग

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