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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 4/33/1

40 Sukta
8 Mantra
4/33/1
Devata- अग्निः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- गायत्री Suktam- पापनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घमग्ने॑ शुशु॒ग्ध्या र॒यिम्। अप॑ नः॒ शोशु॑चद॒घम् ॥

अप॑ । न॒: । शोशु॑चत् । अ॒घम् । अग्ने॑ । शु॒शु॒ग्धि । आ । र॒यिम् । अप॑ । न॒: । शोशु॑चत् । अ॒घम् ॥३३.१॥

Mantra without Swara
अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिम्। अप नः शोशुचदघम् ॥

अप । न: । शोशुचत् । अघम् । अग्ने । शुशुग्धि । आ । रयिम् । अप । न: । शोशुचत् । अघम् ॥३३.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (न:) = हमसे होनेवाला (अघम्) = पाप (अप) = दूर होकर (शोशुचत्) = ठहरने का स्थान न रहने से शोक-सन्तप्त होकर नष्ट हो जाए। हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! आप (रयिम्) = हमारे धनों को (शुशुग्धि) = सब प्रकार से शुद्ध कर दीजिए। हमारा धन सुपथ से कमाया जाकर प्रकाशमय ही हो। २. वस्तुत: शुद्ध मार्ग से ही धन कमाना है, इस वृत्ति के आते ही पाप समाप्त हो जाते हैं। अन्याय से धन कमाने की वृत्ति के मूल में 'लोभ' है। यह लोभ ही सब पापों का मूल है, अत: हे प्रभो! आप हमारे इस लोभ को दूर करके धन को पवित्र कीजिए, जिससे हमारा यह सब (अघम्) = पाप (अप) = हमसे दूर होकर (शोशुचत्) = शोक-सन्तप्त होकर नष्ट हो जाए।

 
Essence
हम पवित्र कर्मों से ही धन कमाएँ। ऐसा होने पर न लोभ होगा और न पाप। पवित्र धन हमारे सब पापों को नष्ट कर देगा।
Subject
पवित्र धन