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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 4/32/6

40 Sukta
7 Mantra
4/32/6
Devata- मन्युः Rishi- ब्रह्मास्कन्दः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- सेनासंयोजन सूक्त
Mantra with Swara
अ॒यं ते॑ अ॒स्म्युप॑ न॒ एह्य॒र्वाङ्प्र॑तीची॒नः स॑हुरे विश्वदावन्। मन्यो॑ वज्रिन्न॒भि न॒ आ व॑वृत्स्व॒ हना॑व॒ दस्यूं॑रु॒त बो॑ध्या॒पेः ॥

अ॒यम् । ते॒ । अ॒स्मि॒ । उप॑ । न॒: । आ । इ॒हि॒ । अ॒र्वाङ् । प्र॒ती॒ची॒न: । स॒हु॒रे॒ । वि॒श्व॒ऽदा॒व॒न् । मन्यो॒ इति॑ । व॒ज्रि॒न् । अ॒भि । न॒: । आ । व॒वृ॒त्स्व॒ । हना॑व । दस्यू॑न् । उ॒त । बो॒धि॒ । आ॒पे: ॥३२.६॥

Mantra without Swara
अयं ते अस्म्युप न एह्यर्वाङ्प्रतीचीनः सहुरे विश्वदावन्। मन्यो वज्रिन्नभि न आ ववृत्स्व हनाव दस्यूंरुत बोध्यापेः ॥

अयम् । ते । अस्मि । उप । न: । आ । इहि । अर्वाङ् । प्रतीचीन: । सहुरे । विश्वऽदावन् । मन्यो इति । वज्रिन् । अभि । न: । आ । ववृत्स्व । हनाव । दस्यून् । उत । बोधि । आपे: ॥३२.६॥

Meaning
१. ज्ञान-रुचि बनकर यह कहता है कि हे ज्ञान! (अयं ते अस्मि) = यह मैं तेरा है, अर्थात् अब मैं ज्ञान का भक्त बन गया हूँ। (उप नः अर्वाङ् आ इह) = तू हमें समीपता से अभिमुख होता हुआ प्राप्त हो। (प्रतीचीन:) = मेरे शत्रुओं के प्रति गति करता हुआ तू मुझे प्राप्त हो। सहुरे-हे शत्रुओं का पराभव करनेवाले ज्ञान! (विश्वदावन्) = तू हमारे लिए सब ऐश्वयों का देनेवाला है। (हे वज्रिन्) = क्रियाशील-हमें क्रियाशील बनानेवाले (मन्यो) = ज्ञान! तु (नः अभि:) = हमारी ओर (आववृत्स्व) = आनेवाला हो। तू हमें सदा प्राप्त हो । (दस्यून हनाव) = हम तेरे साथ मिलकर दस्युओं का हनन करनेवाले हों। तेरे द्वारा हम दास्यबवृत्तियों को नष्ट कर सकें, (उत) = और हे ज्ञान! तू (आपे:) = अपने मित्र का-मेरा (बोधि) = ध्यान करनेवाला हो। तुझे ही शत्रुओं के संहार के द्वारा हमारा रक्षण करना है।
Essence
जिस दिन हम ज्ञान के आराधक बनते हैं, वह दिन हमारे सौभाग्यवाला होता है। इस ज्ञान के साथ मिलकर हम दास्यववृत्तियों का संहार करनेवाले बनें।
Subject
ज्ञान के प्रति रुचि-सौभाग्य

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