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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 4/32/2

40 Sukta
7 Mantra
4/32/2
Devata- मन्युः Rishi- ब्रह्मास्कन्दः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- सेनासंयोजन सूक्त
Mantra with Swara
म॒न्युरिन्द्रो॑ म॒न्युरे॒वास॑ दे॒वो म॒न्युर्होता॒ वरु॑णो जा॒तवे॑दाः। म॒न्युर्विश॑ ईडते॒ मानु॑षी॒र्याः पा॒हि नो॑ मन्यो॒ तप॑सा स॒जोषाः॑ ॥

म॒न्यु: । इन्द्र॑: । म॒न्यु: । ए॒व । आ॒स॒ । दे॒व: । म॒न्यु: । होता॑ । वरु॑ण: । जा॒तऽवे॑दा: । म॒न्युम् । विश॑: । ई॒ड॒ते॒ । मानु॑षी: । या: । पा॒हि । न॒: । म॒न्यो॒ इति॑ । तप॑सा । स॒ऽजोषा॑:॥३२.२॥

Mantra without Swara
मन्युरिन्द्रो मन्युरेवास देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदाः। मन्युर्विश ईडते मानुषीर्याः पाहि नो मन्यो तपसा सजोषाः ॥

मन्यु: । इन्द्र: । मन्यु: । एव । आस । देव: । मन्यु: । होता । वरुण: । जातऽवेदा: । मन्युम् । विश: । ईडते । मानुषी: । या: । पाहि । न: । मन्यो इति । तपसा । सऽजोषा:॥३२.२॥

Meaning
१. यह (मन्युः) = ज्ञान ही (इन्द्रः) = इन्द्र है। ज्ञान ही हमें इन्द्रियों का अधिष्ठाता बनाता है। इस ज्ञान से ही हम आसुरवृत्तियों का संहार करनेवाले वृत्रहन्ता 'इन्द्र' बनते हैं। (मन्युः एव) = यह ज्ञान ही (देव: आस) = देव है। यही हमें दिव्य वृत्तियोंवाला बनाता है। ज्ञानी पुरुष ही संसार की सब क्रियाओं को एक खिलाड़ी की मनोवृत्ति से करता हुआ सच्चा देव बनता है [दिव् क्रीडायाम्]। (मन्यु:) = ज्ञान ही (होता) = दानपूर्वक अदन करनेवाला-यज्ञ करके यज्ञशेष का सेवन करनेवाला होता है। ज्ञानी कभी अकेला नहीं खाता-सबके साथ बाँटकर ही खाता है। यह मन्यु ही (वरुण:) = हमसे द्वेष का निवारण करनेवाला होता है और (जातवेदा:) = [वेदस्-wealth] आवश्यक धनों को उत्पन्न करनेवाला है। ज्ञान से मनुष्य में आवश्यक धन को उत्पन्न करने की योग्यता आ जाती है। २. (या: मानुषी: विश:) = जो विचारशील प्रजाएँ हैं वे (मन्युः) [मन्युम्] (ईडते) = ज्ञान को उपासित करती हैं। ये ज्ञान की साधना में प्रवृत्त होती हैं। हे मन्यो-ज्ञान ! तपसा (सजोषा:) = तप के साथ हमारे लिए समान प्रीतिवाला होता हुआ (नः पाहि) = तू हमारा रक्षण कर। तपस्या के साथ ही ज्ञान का निवास है।
Essence
ज्ञान से हम जितेन्द्रिय, दिव्य गुणोंवाले, दाता, निष तथा धनार्जन की क्षमतावाले होते हैं। यह ज्ञान ही हमारा रक्षण करता है। ज्ञान-साधना के लिए तप आवश्यक है।
Subject
इन्द्र-देव-वरुण-जातवेदाः

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