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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 4/30/6

40 Sukta
8 Mantra
4/30/6
Devata- सर्वरूपा सर्वात्मिका सर्वदेवमयी वाक् Rishi- अथर्वा Chhanda- जगती Suktam- राष्ट्रदेवी सुक्त
Mantra with Swara
अ॒हं सोम॑माह॒नसं॑ बिभर्म्य॒हं त्वष्टा॑रमु॒त पू॒षणं॒ भग॑म्। अ॒हं द॑धामि॒ द्रवि॑णा ह॒विष्म॑ते सुप्रा॒व्या॑ यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥

अ॒हम् । सोम॑म् । आ॒ह॒नस॑म् । बि॒भ॒र्मि॒ । अ॒हम् । त्वष्टा॑रम् । उ॒त । पू॒षण॑म् । भग॑म् । अ॒हम् । द॒धा॒मि॒ । द्रवि॑णा । ह॒विष्म॑ते । सु॒प्र॒ऽअ॒व्या᳡ । यज॑मानाय । सु॒न्व॒ते ॥३०.६॥

Mantra without Swara
अहं सोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्। अहं दधामि द्रविणा हविष्मते सुप्राव्या यजमानाय सुन्वते ॥

अहम् । सोमम् । आहनसम् । बिभर्मि । अहम् । त्वष्टारम् । उत । पूषणम् । भगम् । अहम् । दधामि । द्रविणा । हविष्मते । सुप्रऽअव्या । यजमानाय । सुन्वते ॥३०.६॥

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Meaning
१. (अहम्) = मैं (सोमम्) = उस सोम [वीर्यशक्ति] को उपासकों के शरीर में (बिभर्मि) = धारण करता हूँ जोकि (आहनसम्) = शरीर के सब रोगों का हनन करनेवाला है। (अहं त्वष्टारम्) = मैं निर्माण की देवता को (उत) = और (पूषणं भगम्) = पोषण के लिए आवश्यक ऐश्वर्य को धारण करता हूँ, (अहं) = मैं (हविष्मते) = हविष्मान् के लिए-सदा दानपूर्वक अदन [ भोग] करनेवाले के लिए द्रविणा (दधामि) = धनों का धारण करता हूँ, इस (हविष्मान्) = को धनों की कमी नहीं रहती। (सन्वते) = अपने अन्दर सोमशक्ति का सम्पादन करनेवाले (यजमानाय) = यज्ञशील पुरुष के लिए मैं (सप्राव्या) = उत्तमता से प्रकृष्ट रक्षण करनेवाले धनों का धारण करता हूँ। 'सुन्वन्' का भाव 'निर्माणात्मक कर्मों को करना' भी है। इस निर्माण के कार्य में लगे हुए व्यक्ति के लिए भी प्रभु धनों की कभी कमी नहीं होने देते।
Essence
प्रभु वीर्यशक्ति प्राप्त कराके उपासक को नीरोग बनाते हैं, उसे निर्माणात्मक कार्यों में प्रवृत्त करके पोषण के लिए पर्याप्त धन प्रास कराते है। प्रभु 'हविष्मान्, यज्ञमान व सुन्बन्' पुरुष को उत्तम धन प्राप्त कराते हैं।
Subject
'हविष्मान्, यजमान, सुन्वन्'