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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 4/30/4

40 Sukta
8 Mantra
4/30/4
Devata- सर्वरूपा सर्वात्मिका सर्वदेवमयी वाक् Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- राष्ट्रदेवी सुक्त
Mantra with Swara
मया॒ सोऽन्न॑मत्ति॒ यो वि॒पश्य॑ति॒ यः प्रा॒णति॒ य ईं॑ शृ॒णोत्यु॒क्तम्। अ॑म॒न्तवो॒ मां त उप॑ क्षियन्ति श्रु॒धि श्रु॑त श्रु॒द्धेयं॑ ते वदामि ॥

मया॑ । स: । अन्न॑म् । अ॒त्ति॒ । य: । वि॒ऽपश्य॑ति । य: । प्रा॒णति॑ । य: । ई॒म् । शृ॒णोति॑ । उ॒क्तम् । अ॒म॒न्तव॑: । माम् । ते । उप॑ । क्षि॒य॒न्ति॒ । श्रु॒धि । श्रु॒त॒ । श्र॒त्ऽधेय॑म् । ते॒ । व॒दा॒मि॒ ॥३०.४॥

Mantra without Swara
मया सोऽन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणति य ईं शृणोत्युक्तम्। अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रुद्धेयं ते वदामि ॥

मया । स: । अन्नम् । अत्ति । य: । विऽपश्यति । य: । प्राणति । य: । ईम् । शृणोति । उक्तम् । अमन्तव: । माम् । ते । उप । क्षियन्ति । श्रुधि । श्रुत । श्रत्ऽधेयम् । ते । वदामि ॥३०.४॥

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Meaning
१. (स:) = वह (मया) = मुझसे ही (अन्नम् अत्ति) = अन्न खाता है, (यः) = जो (विपश्यति) = देखता है। वे प्राणी जो देखते हैं-कुछ समझते नहीं, वे (अत्यन्त स्थिर) = सी अवस्था में पड़े हुए क्षुद्र जन्तु मुझसे ही भोजन खाते-प्राप्त करते हैं। इसीप्रकार (य:) = जो (प्राणति) = श्वासोच्छ्वास लेते हुए जीवन बिता रहे हैं, वे भी मुझसे ही अन्न प्राप्त करते हैं। केवल देखनेवालों से ये कुछ उत्कृष्ट हैं। इनसे भी उत्कृष्ट वे हैं, (ये) = जो (ईम्) = निश्चय से (उक्तम् शृणोति) = कहे हुए को सुनता है । इसप्रकार श्रवण से ज्ञान की वृद्धि करनेवाले मनुष्य भी मुझसे ही अन्न खाते हैं। २. (ते अमन्तवः) = वे मनन व विचार से शून्य लोग-अतएव मुझे न माननेवाले-भोगप्रधान वृत्तिवाले लोग भी (माम् उपक्षियन्ति) = मेरे आधार से ही निवास करते हैं। मेरे आधार से जीते हुए भी वे माया से मोहित हुए-हुए मुझे नहीं देखते, परन्तु प्रभु का प्रिय पुत्र तो वही है जो मायामूढ़ न बनकर प्रभु की प्रेरणा को सुनता है। 'अमन्तवः' शब्द का अर्थ मन्तुरहित [आगोऽपराधो मन्तुश्च], अर्थात् अपराधरहित निर्दोष भी है, (ते) = वे निर्दोष जीवनवाले व्यक्ति (माम् उपक्षियन्ति) = मेरे समीप निवास करते हैं। जितने-जितने हम निर्दोष होते जाते हैं, उतने-उतने ही प्रभु के प्रिय बनते जाते हैं। हे (श्रुत) = अन्त:स्थित प्रभु की प्रेरणा को सुननेवाले जीव! (श्रुधि) = सुन। (श्रद्धेयम्) = श्रद्धा से लभ्य आत्मज्ञान को मैं (ते वदामि) = तेरे लिए कहता हूँ। प्रभु की वाणी को सुननेवाला श्रद्धावान् पुरुष ही ज्ञान प्राप्त करता है।
Essence
केवल देखनेवाले, श्वासोच्छस लेनेवाले तथा सुनकर ज्ञान प्राप्त करनेवाले सभी प्रभु से ही अन्न प्राप्त करते हैं। मननरहित भोगप्रधान पुरुषों को भी प्रभु ही भोजन देते हैं और श्रद्धायुक्त होकर उपासक प्रभु से ही आत्मज्ञान प्राप्त करते हैं।
Subject
सर्वपालक प्रभु