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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 4/26/7

40 Sukta
7 Mantra
4/26/7
Devata- द्यावापृथिवी Rishi- मृगारः Chhanda- शाक्वरगर्भातिमध्येज्योतिस्त्रिष्टुप् Suktam- पापमोचन सूक्त
Mantra with Swara
यन्मेदम॑भि॒शोच॑ति॒ येन॑येन वा कृ॒तं पौरु॑षेया॒न्न दैवा॑त्। स्तौमि॒ द्यावा॑पृथि॒वी ना॑थि॒तो जो॑हवीमि॒ ते नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥

यत् । मा । इ॒दम् । अ॒भि॒ऽशोच॑ति । येन॑ऽयेन । वा॒ । कृ॒तम् । पौरु॑षेयात् । न । दैवा॑त् । स्तौमि॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । ना॒थि॒त: । जो॒ह॒वी॒मि॒ । ते इति॑ । न॒: । मु॒ञ्च॒त॒म् । अंह॑स: ॥२६.७॥

Mantra without Swara
यन्मेदमभिशोचति येनयेन वा कृतं पौरुषेयान्न दैवात्। स्तौमि द्यावापृथिवी नाथितो जोहवीमि ते नो मुञ्चतमंहसः ॥

यत् । मा । इदम् । अभिऽशोचति । येनऽयेन । वा । कृतम् । पौरुषेयात् । न । दैवात् । स्तौमि । द्यावापृथिवी इति । नाथित: । जोहवीमि । ते इति । न: । मुञ्चतम् । अंहस: ॥२६.७॥

Meaning
१. (यत्) = जो (इदम्) = यह पाप तथा पाप का फल दुःख (मा) = मुझे (अभिशोचति) = सर्वत: शोकसन्तप्त करता है, (येनयेन वा) = अथवा जिस-जिस पाप से (कृतम्) = उत्पन्न हुआ-हुआ दु:ख मुझे सन्तस करता है, यह सब दुःख (पौरुषेयात्) = पुरुष से की गई गलती का ही परिणाम है, (न देवात्) = द्यावापृथिवी आदि देवों से वह कष्ट प्राप्त नहीं होता। द्यावापृथिवी तो हमारे लिए सब उत्तम वस्तुओं को ही प्राप्त कराते हैं। मनुष्य उनका अनुचित प्रयोग करता है और कष्ट भोगी होता है। द्यावापृथिवी ने 'गो' दूध के लिए प्राप्त कराई है न कि उसका मांस खाने के लिए। मनुष्य गोदुग्ध का प्रयोग न करके गोमांस का सेवने करने लगता है और परिणामत: नाना रोगों का शिकार होता है। २. मैं (द्यावापृथिवी स्तौमि) = इन द्यावापृथिवी का स्तवन करता हूँ और (नाथित:) = कष्टों से सन्तस होने पर (जोहवीमि) = इन्हें ही पुकारता हूँ। (ते) = वे द्यावापृथिवी (न:) = हमें (अंहसः मुञ्चतम्) = पाप से मुक्त करें।
Essence
कष्ट हमें अपने पापों के कारण होते हैं। द्यावापृथिवी आदि हमें कष्ट नहीं पहुँचाते। इनके द्वारा प्रदत्त वस्तुओं का ठीक प्रयोग करते हुए हम सुखी हों।

अगला सूक्त भी 'मृगार' ऋषि का ही है -
Subject
पौरुषेयात् न दैवात्

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